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तुलसी की वाणी से लोकचेतना तक : आज होगा अवधी साहित्य के एक सांस्कृतिक अनुष्ठान का समापन

 

वरिष्ठ पत्रकार वैद्यराज संजय पांडेय स्टेट हेड उत्तर प्रदेश

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तुलसी की वाणी से लोकचेतना तक : आज होगा अवधी साहित्य के एक सांस्कृतिक अनुष्ठान का समापन

# नेपाल से अवध की धरती तक निकली तुलसी यात्राओं ने दिया लोकभाषा, संस्कृति और साहित्य के पुनर्जागरण का संदेश; 15 अवधी आराधकों को मिलेगा ‘सूबेदार-राजदेवी अवधी सम्मान-2026’

“जिस भाषा में तुलसी ने लोक को राम दिया और राम को लोक का बनाया, वह अवधी केवल अतीत की विरासत नहीं—वह भारतीय संस्कृति की वह जीवित चेतना है, जिसे बचाना अपने सांस्कृतिक भविष्य को बचाना है।”

बीकेटी/लखनऊ : अवधी साहित्य के संवर्धन, संरक्षण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उद्देश्य से आयोजित गोस्वामी तुलसीदास जयंती पखवाड़े का समापन समारोह सोमवार, 31 अगस्त 2026 को बख्शी का तालाब स्थित एसआर ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स, लखनऊ में होगा। इस अवसर पर अवधी भाषा, साहित्य और लोकसंस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले 15 अवधी आराधकों को प्रतिष्ठित ‘सूबेदार-राजदेवी अवधी सम्मान-2026’ से अलंकृत किया जाएगा।

अवध भारती संस्थान, उत्तर प्रदेश की ओर से आयोजित इस समारोह को केवल एक सम्मान समारोह नहीं, बल्कि तुलसी की लोकभाषा, अवधी की सांस्कृतिक स्मृति और समकालीन समाज के बीच संवाद स्थापित करने वाले व्यापक साहित्यिक-सांस्कृतिक अभियान के रूप में देखा जा रहा है। संस्थान के नेतृत्व में तुलसीदास जयंती पखवाड़े के दौरान नेपाल सहित उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में तुलसी यात्राओं का आयोजन किया गया और इन यात्राओं के समापन पर तुलसी सभाओं के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास की साहित्यिक विरासत, अवधी की सांस्कृतिक चेतना तथा लोकभाषा के भविष्य पर विमर्श किया गया।

अवध भारती संस्थान के अध्यक्ष राम बहादुर मिश्र के अगुवाई में हुए इन आयोजनों ने अवधी को केवल एक बोली या क्षेत्रीय भाषिक पहचान के रूप में देखने के बजाय उसे लोकसंस्कृति, जनस्मृति, अध्यात्म, काव्य, दर्शन और सामाजिक जीवन की बहुरंगी अभिव्यक्ति के रूप में रेखांकित किया। नेपाल से लेकर उत्तर प्रदेश के अलग-अलग अंचलों तक निकली तुलसी यात्राओं ने इस सांस्कृतिक परंपरा की व्यापक भौगोलिक और सामाजिक उपस्थिति को भी सामने रखा।

समापन समारोह का आयोजन 31 अगस्त, सोमवार को पूर्वाह्न 11 बजे किया जाएगा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सीतापुर के एमएलसी एवं एसआर ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स के चेयरमैन पवन सिंह चौहान होंगे। समारोह की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित करेंगे, जबकि संचालन वरिष्ठ पत्रकार नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान द्वारा किया जाएगा।

## 15 अवधी आराधकों को मिलेगा सम्मान

समारोह में अवधी भाषा एवं साहित्य की साधना, संवर्धन और प्रसार में योगदान के लिए प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित, डॉ. राम बहादुर मिश्र, सर्वेश अस्थाना, डॉ. अर्जुन पाण्डेय, आत्म प्रकाश मिश्र, सुमोना एस. पांडेय, कुसुम वर्मा, नीरजा शुक्ला, सुशील कुमार राय, प्रदीप सारंग, सुनील कुमार वर्मा, रमाकांत तिवारी रामिल, योगेश चौहान, चेतराम अज्ञानी एवं नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान को ‘सूबेदार-राजदेवी अवधी सम्मान-2026’ से सम्मानित किया जाएगा।

आयोजकों के अनुसार यह सम्मान एमएलसी पवन सिंह चौहान के माता-पिता की सुस्मृति में प्रदान किया जा रहा है। इस दृष्टि से यह सम्मान केवल साहित्यकारों का अभिनंदन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोकभाषायी और सांस्कृतिक विरासत के प्रति सामाजिक कृतज्ञता का प्रतीक भी है।

## तुलसी यात्रा : स्मरण से आगे, संस्कृति का पुनर्पाठ

तुलसीदास की परंपरा भारतीय साहित्य और लोकसंस्कृति में केवल धार्मिक आख्यानों तक सीमित नहीं रही। उनकी काव्य-चेतना ने लोकभाषा को साहित्यिक गरिमा प्रदान करते हुए सामान्य जन के भाव-जगत, नैतिक प्रश्नों, सामाजिक संबंधों और आध्यात्मिक आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दी। इसी व्यापक संदर्भ में तुलसी यात्राओं को लोकभाषा और सांस्कृतिक स्मृति के पुनर्पाठ का अभियान माना जा रहा है।

अवधी की सांस्कृतिक यात्रा में तुलसी का स्थान इसलिए भी विशिष्ट है कि उनकी रचनाधारा ने भाषा को केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे लोकानुभव और जनचेतना का साहित्यिक स्वर बनाया। ऐसे समय में जब स्थानीय भाषाओं और बोलियों के सामने वैश्वीकरण, डिजिटल संस्कृति और भाषायी एकरूपता की चुनौतियां बढ़ रही हैं, तुलसी यात्राओं और तुलसी सभाओं जैसे आयोजनों का महत्व केवल स्मृति-उत्सव तक सीमित नहीं रह जाता।

नेपाल सहित विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित कार्यक्रमों ने इस प्रश्न को भी रेखांकित किया कि अवधी की सांस्कृतिक सीमाएं प्रशासनिक सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक हैं। लोकगीत, लोककथा, रामकथा, काव्य, बोली, पर्व, रीति-रिवाज और जनजीवन की साझा परंपराएं इस पूरे भूभाग को एक गहरी सांस्कृतिक निरंतरता में जोड़ती हैं।

## अवधी का सवाल : विरासत से भविष्य की ओर

अवधी साहित्य के सामने आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल उसकी गौरवशाली परंपरा का स्मरण नहीं, बल्कि उसके भविष्य को सुरक्षित और सशक्त बनाने का है। नई पीढ़ी के पाठकों तक अवधी साहित्य कैसे पहुंचे, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में लोकभाषाओं के अध्ययन का दायरा कैसे बढ़े, डिजिटल माध्यमों में अवधी की उपस्थिति कैसे मजबूत हो, और नई रचनाशीलता किस प्रकार पारंपरिक विरासत को समकालीन जीवन से जोड़े—ये वे सवाल हैं जो किसी भी गंभीर अवधी विमर्श के केंद्र में होने चाहिए।

इसी अर्थ में तुलसी जयंती पखवाड़ा एक स्मारकीय आयोजन से आगे बढ़कर सांस्कृतिक आत्मचिंतन का अवसर बनता है। तुलसी का पुनर्पाठ तभी सार्थक होगा जब वह अतीत की वंदना के साथ वर्तमान की समस्याओं, मानवीय संवेदनाओं और भविष्य की सांस्कृतिक आकांक्षाओं से भी संवाद करे।

## साहित्य, लोक और संस्थाओं का साझा मंच

समारोह में विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाओं का सहयोग भी उल्लेखनीय है। इनमें एसआर ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स, बीकेटी; उप्र साहित्य सभा, लखनऊ; लोकरंग फाउंडेशन, लखनऊ; आँखें फाउंडेशन, बाराबंकी; अवधी साहित्य संस्थान, अमेठी; कमला नारायण ट्रस्ट, उत्तर प्रदेश; श्रेयस शोध संस्थान, लखनऊ; समदृष्टि सेवा न्यास, रायबरेली; महाजन सेवा संस्थान, त्रिवेदीगंज; गुलजार फाउंडेशन, बाराबंकी; शिव गंगा साहित्य सेवा समिति, मसौली; काव्य कार्यशाला, बाराबंकी तथा लोक संस्कृति शोध संस्थान शामिल हैं।

इन संस्थाओं की सहभागिता यह संकेत देती है कि अवधी के संरक्षण का प्रश्न किसी एक लेखक, संस्था या आयोजन तक सीमित नहीं, बल्कि साहित्य, शिक्षा, शोध, लोकसंस्कृति और सामाजिक भागीदारी के संयुक्त प्रयास का विषय है।

समारोह में तुलसी की साहित्यिक परंपरा पर चर्चा के साथ-साथ अवधी भाषा और साहित्य की वर्तमान स्थिति तथा भविष्य की संभावनाओं पर वैचारिक विमर्श की भी अपेक्षा है। ऐसे विमर्श यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं कि लोकभाषाओं को संग्रहालय की वस्तु बनने से बचाकर उन्हें जीवन्त सृजनशील भाषिक संस्कृति के रूप में कैसे आगे बढ़ाया जाए।

अवधी साहित्य की शक्ति उसकी लोकधर्मिता, उसकी संवेदनात्मक व्यापकता और उसकी स्मृति में निहित है। तुलसी की परंपरा का वास्तविक सम्मान शायद यही है कि उनकी भाषा को केवल जयंती और समारोहों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे “पढ़ा जाए, लिखा जाए, शोधा जाए, डिजिटल दुनिया में पहुंचाया जाए और नई पीढ़ी की रचनात्मक चेतना का हिस्सा बनाया जाए।”

“कलम जब लोकभाषा से जुड़ती है तो साहित्य केवल साहित्य नहीं रहता—वह एक समाज की सामूहिक स्मृति, आत्मा और भविष्य का दस्तावेज बन जाता है” और शायद अवधी साहित्य का सबसे बड़ा उत्सव यही होगा कि तुलसी की भाषा अतीत की विरासत बनकर न ठहरे, बल्कि नई पीढ़ी की आवाज बनकर फिर से उठे—क्योंकि जिस लोकभाषा में जनता अपने सपने देखती है, उसी भाषा में संस्कृति अपना भविष्य लिखती है।

“तुलसी की चौपाइयों से निकली अवधी की यह सांस्कृतिक धारा यदि नई पीढ़ी की चेतना तक पहुंचती रही, तो अवधी केवल स्मृतियों में नहीं रहेगी—वह फिर से साहित्य की भाषा, लोकजीवन की आवाज और भविष्य की सांस्कृतिक पहचान बनकर बहेगी।”

Viyasmani Tripaathi

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