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AI पर भारत का भविष्य गढ़ने 18 माह में जुटे थे 600 से अधिक विशेषज्ञ, UNESCO ने दुनिया को सुनाई बागपत के युवा की आवाज

*AI पर भारत का भविष्य गढ़ने 18 माह में जुटे थे 600 से अधिक विशेषज्ञ, UNESCO ने दुनिया को सुनाई बागपत के युवा की आवाज*

*एआई की दौड़ में गांव क्यों जरूरी हैं? यूनेस्को ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस युवा की कहानी से दुनिया को दिया जवाब*

*भारत की एआई तैयारी पर यूनेस्को की रिपोर्ट, समावेशी एआई की मिसाल बनी बागपत के युवा की कहानी*

*सूचना के अभाव से निकली बागपत के युवा की कहानी को यूनेस्को ने बनाया वैश्विक उदाहरण*

नई दिल्ली/बागपत 26 जून 2026 – गांव-गांव अखबार बेचने वाले एक युवक की कहानी आज दुनिया के सामने भारत में समावेशी एआई की मिसाल बनकर पहुंची है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने भारत की एआई तैयारी पर जारी अपनी वैश्विक रिपोर्ट के साथ बागपत के युवा सामाजिक कार्यकर्ता एवं माय भारत स्वयंसेवक अमन कुमार पर विशेष लेख प्रकाशित किया है। इस लेख में उनकी जीवन यात्रा, विचारों और अनुभवों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य तभी मजबूत होगा, जब गांवों और आम लोगों की आवाज भी उसमें शामिल होगी।

दरअसल, भारत में एआई को लेकर करीब 18 महीने तक चली इस राष्ट्रीय परामर्श प्रक्रिया में सरकार, शिक्षण संस्थानों, उद्योग, स्टार्टअप्स, शोध संस्थानों और नागरिक समाज के 600 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। देश के अलग-अलग हिस्सों में पांच क्षेत्रीय परामर्श आयोजित किए गए। इन्हीं चर्चाओं के आधार पर इंडिया एआई रेडिनेस एसेसमेंट रिपोर्ट तैयार हुई। लेकिन यूनेस्को ने जब भारत की एआई तैयारी को दुनिया के सामने रखा तो उसने बागपत के एक ग्रामीण युवा की कहानी को अपनी वैश्विक प्रस्तुति का हिस्सा बनाया।

नई दिल्ली में आयोजित इस राष्ट्रीय परामर्श में अमन कुमार ने माय भारत स्वयंसेवक के रूप में भाग लिया था। यूनेस्को ने अपने लेख में लिखा कि वे उन कुछ प्रतिभागियों में शामिल थे, जो उन समुदायों का दृष्टिकोण लेकर आए थे जिन पर भविष्य की एआई नीतियों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ने वाला है। संस्था ने केवल उनका उल्लेख नहीं किया, बल्कि उनकी जीवन यात्रा, संघर्ष, अनुभव, आकांक्षाओं और कई विचारों को केंद्र में रखकर अलग वैश्विक लेख प्रकाशित किया।

यहीं इस कहानी की खासियत भी है। आमतौर पर वैश्विक तकनीकी रिपोर्टों के साथ वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों या तकनीकी विशेषज्ञों की कहानियां सामने आती हैं। लेकिन भारत की एआई तैयारी पर प्रकाशित इस लेख में यूनेस्को ने एक ऐसे ग्रामीण युवा की यात्रा को दुनिया के सामने रखा, जिसने बचपन में सूचना के अभाव को खुद महसूस किया और बाद में उसी कमी को दूर करने को अपना सामाजिक मिशन बना लिया।

बागपत जिले के एक गांव में पले-बढ़े अमन कुमार स्कूल जाने से पहले गांव-गांव अखबार बेचते थे। उन्हीं अखबारों में छपी छात्रवृत्तियों, प्रतियोगिताओं और युवा कार्यक्रमों की खबरों ने उनके लिए नए रास्ते खोले। तब उन्हें एहसास हुआ कि गांवों में प्रतिभा की नहीं, अवसरों तक पहुंच की कमी है। यही सोच आगे चलकर युवाओं तक अवसरों की जानकारी पहुंचाने के उनके प्रयासों की नींव बनी।

यूनेस्को ने अपनी कहानी में इसी अनुभव को एआई के भविष्य से जोड़ा है। संस्था के अनुसार, डिजिटल विभाजन और समावेशी शासन जैसे शब्दों को समझने से पहले ही अमन उनके प्रभाव को अपने जीवन में जी चुके थे। इसलिए जब एआई पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई तो उन्होंने तकनीक से पहले लोगों की बात उठाई।

परामर्श के दौरान अमन कुमार ने कहा कि युवा केवल दर्शक नहीं बनना चाहते, बल्कि भविष्य निर्माण में भागीदार बनना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि नीतियां समुदायों की बात सुने बिना बनाई जाएंगी तो नई तकनीक पहले से मौजूद असमानताओं को और बढ़ा सकती है। यूनेस्को ने उनके इन विचारों को अपने वैश्विक लेख में प्रमुखता से स्थान दिया है।

रिपोर्ट भारत की उपलब्धियों की भी सराहना करती है। इसके अनुसार भारत आज वैश्विक एआई प्रतिभा का लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा रखता है और वर्ष 2010 के बाद से 86 हजार से अधिक एआई पेटेंट दाखिल कर चुका है। इंडिया एआई मिशन, बहुभाषी एआई और डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं जैसी पहलों को भारत की बड़ी ताकत बताया गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि अब अगली चुनौती इन उपलब्धियों का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचाना है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में है। 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 37 करोड़ युवा आने वाले समय में एआई से सबसे अधिक प्रभावित होंगे। ऐसे में यूनेस्को का मानना है कि तकनीक की दिशा तय करने वाली चर्चाओं में युवाओं, ग्रामीण भारत और वंचित समुदायों की भागीदारी बढ़ाना उतना ही जरूरी है, जितना नई तकनीक विकसित करना।

बागपत से निकली यह कहानी उस बदलते भारत की तस्वीर भी है, जहां गांव की आवाज अब राष्ट्रीय नीति संवाद से आगे बढ़कर वैश्विक मंच तक पहुंच रही है। शायद यही यूनेस्को के इस विशेष लेख का सबसे बड़ा संदेश भी है कि एआई का भविष्य तभी समृद्ध होगा, जब उसकी दिशा तय करने वाली चर्चाओं में समाज का हर वर्ग बराबरी से शामिल होगा।

एक नजर में-

-18 माह चली राष्ट्रीय परामर्श प्रक्रिया

5 क्षेत्रीय परामर्श

-600+ हितधारकों की भागीदारी

-भारत में वैश्विक एआई प्रतिभा का 16%

-86,000+ एआई पेटेंट

-यूनेस्को की वैश्विक वेबसाइट पर विशेष लेख

-माय भारत स्वयंसेवक अमन कुमार के प्रयासों और विचारों को वैश्विक मान्यता

*सूचना विभाग बागपत*

Viyasmani Tripaathi

Cheif editor Mobile no 9795441508/7905219162

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