कहानियां

उस रोज का हादसा: एक सफर जिसने जिंदगी की सबसे बड़ी सीख दे दी

उस रोज का हादसा

लेखिका: अंजली पाण्डेय

गर्मियों की रातों में जब चांद अपनी चांदनी चारों ओर बिखेर देता है और हल्की-हल्की ठंडी हवाएं चलती हैं, तब मुझे ऐसी चांदनी रात में अकेले बैठना और टहलना बहुत अच्छा लगता है। आज की रात भी कुछ ऐसी ही थी, इसलिए मैं छत पर चली गई।

छत पर बैठते-बैठते मुझे उस रोज की याद आ गई, जिस दिन मैं प्रेमपुर जाने के लिए अपने घर से निकली थी और रास्ते में मुझे जिंदगी की एक बहुत बड़ी सीख मिली थी।

उस दिन मैं काफी देर तक बस का इंतजार करती रही। काफी देर बाद एक बस आई। उस बस का नाम था “इश्क”। उस बस के ड्राइवर का नाम “दौलत” था और कंडक्टर का नाम “हैसियत”।

मैंने कंडक्टर से पूछा, “क्या यह बस प्रेमपुर जाएगी?”

कंडक्टर ने जवाब दिया, “जी हां, मैं प्रेमपुर तक चलूंगा, मगर उसका किराया है दिलों का सुकून। प्रेमपुर तक जाने के लिए दिलों का सुकून देना पड़ता है।”

इतने में कंडक्टर हैसियत ने ड्राइवर दौलत से कहा,

“चल भाई, बस को आगे बढ़ा। इसके पास न तो दौलत की दौलत है और न ही सूरत की दौलत।”

बस आगे बढ़ गई। थोड़ी ही दूर पर एक बहुत ही खूबसूरत लड़की खड़ी थी। बस उसके पास जाकर अपने-आप रुक गई। कंडक्टर हैसियत ने उसकी सूरत देखते हुए कहा,

“आइए, बैठिए।”

वह लड़की बस में बैठ गई और बस आगे बढ़ गई। मैं वहीं खड़ी इंतजार करती रह गई।

थोड़ी देर बाद एक और बस आई। उस बस का नाम “फिक्र” था। उसके ड्राइवर का नाम “सब्र” और कंडक्टर का नाम “तौहीन” था। यह बस अपने मुसाफिरों को भरोसापुर से उठाकर दगागंज तक ले जाती थी।

मैंने कंडक्टर से पूछा, “क्या यह बस प्रेमपुर जाएगी?”

कंडक्टर ने कहा, “जी हां, जाएगी, मगर दिखावे वाले रास्ते से होकर जाएगी। आजकल ज्यादातर लोग इसी दिखावे वाले रास्ते से जाना ज्यादा बेहतर समझते हैं।”

कंडक्टर की बात सुनकर मैं थोड़ा चौंक गई, लेकिन मैंने उसकी बात को नजरअंदाज करते हुए बस में बैठने का फैसला कर लिया।

बस में बैठने के बाद कंडक्टर तौहीन ने कई बार मेरी बेइज्जती की। कई बार तो बस में बैठे यात्रियों के साथ मिलकर भी उसने मेरा अपमान किया। मैं सब कुछ चुपचाप सहती रही।

कुछ समय बाद उसने मेरे चरित्र पर भी उंगली उठानी शुरू कर दी। तब मैंने सोचा कि अगर मैं आज प्रेमपुर नहीं पहुंच पाई तो मुझे उतना दुख नहीं होगा, जितना दुख इस अपमान से होगा।

मैंने सोचा कि अगर मैं एक पल और इस बस में बैठी रही तो मेरा खुदा भी मुझसे नाराज हो जाएगा।

यह सोचकर मैंने बस रुकवाई और तुरंत बस से उतर गई।

उस दिन मैंने खुद से वादा किया कि अब मैं अपनी पूरी जिंदगी में दोस्ती का ऑटो, धैर्य की बैलगाड़ी या खुदा की उंगली पकड़कर चलना ज्यादा बेहतर समझूंगी, लेकिन कभी भी इश्क और फिक्र की बस में नहीं बैठूंगी।

उस रोज के हादसे की वजह से मैंने अपनी जिंदगी में फिर कभी इश्क या फिक्र की बस नहीं पकड़ी।

Viyasmani Tripaathi

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