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झूठे बर्तनों से सफेद कोट तक: बायतु के NEET 2025 चयनित श्रवण का “गौरव सम्मान”

ब्यूरो चीफ सन्तोष कुमार गर्ग

 

बालोतरा। विद्यालय प्रवक्ता एवं मीडिया प्रभारी अयूब के. सिलावट ने बताया कि स्थानीय शांति निकेतन इंग्लिश मीडियम सीनियर सेकेंडरी स्कूल बालोतरा में एक भव्य ‘गौरव समारोह’ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर NEET 2025 की परीक्षा में 556 अंक प्राप्त कर ऑल इंडिया में 9754वीं रैंक हासिल करने वाले श्रवण कुमार, उनके माता-पिता, तथा ‘फिफ्टी विलेजर्स सेवा संस्थान बाड़मेर’ से डॉ. भरत सारण एवं चिमनाराम जाणी का विद्यालय परिवार द्वारा सम्मान किया गया।

प्राचार्या सुधा मदान ने बताया कि यह प्रतिभा, रेत के धोरों में, दो कच्ची झोपड़ियों के बीच पली-बढ़ी है – न कोई कोचिंग, न कोई विशेष सुविधा, सिर्फ़ मेहनत, माता-पिता का त्याग और ‘फिफ्टी विलेजर्स – बाड़मेर’ संस्था का साथ। श्रवण के पिता, रेखाराम जी सियाग, शादी-ब्याह में झूठे बर्तन धोकर मज़दूरी और खेतीबाड़ी करके घर चलाते थे। जब बेटे की सफलता की खबर मिली तो उनकी आँखों में सुकून था और वे बोले – “अब तो झूठे बर्तनों से पीछा छूटा!” यह एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि विकट परिस्थितियों में वर्षों के संघर्ष की टीस और एक पिता की आँखों का सुकून है। यह सफलता केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि थार क्षेत्र की प्रतिभाओं के लिए एक प्रेरणादायक और गौरवपूर्ण मिसाल बन गई है।

“जिसके सिर पर छत नहीं थी, उसने डॉक्टर बनने का सपना देखा। जिसके घर में बारिश टपकती थी, उसकी आँखों से उम्मीद कभी नहीं टपकी। झोपड़ी में पला, लेकिन सोच आसमान छू गई।” श्रवण कुमार उन लाखों छात्रों के लिए प्रेरणा हैं, जो परिस्थितियों से हार मान लेते हैं। डॉ. भरत सारण और उनकी ‘फिफ्टी विलेजर्स’ टीम ने रेगिस्तान की झोपड़ी से हीरा तराश कर दिखाया है। पिछले कई वर्षों से जिस तरह वे गाँवों से प्रतिभाओं को तराश कर सैकड़ों बच्चों को नई राह दिखा रहे हैं, वह अद्भुत है। उन्होंने उन बच्चों को मौका दिया, जिनके सपनों को कोई देखता भी नहीं था।

थार भूमि की झोपड़ी से निकलकर प्रेरणादायक संघर्ष से डॉक्टर बनने की उड़ान पाने पर विद्यालय परिवार ने श्रवण कुमार सियाग को बहुत-बहुत बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ प्रेषित कीं।

*गरीबी से जूझता बचपन, लेकिन सपना कभी नहीं टूटा-*

डॉ. भरत सारण ने विद्यार्थियों के समक्ष अपने मोटिवेशनल भाषण में बताया कि श्रवण कुमार का बचपन अभावों में बीता। उसके पिता स्थानीय शादियों व अन्य सामाजिक आयोजनों में झूठे बर्तन धोकर परिवार का गुज़ारा करते हैं। इतनी आर्थिक कठिनाई थी कि कोचिंग संस्थान में पढ़ाई कर पाना तो दूर, किताबें और शांत माहौल तक उपलब्ध नहीं था। परिवार की झोपड़ी में गर्मी, धूल और परेशानियों के बीच श्रवण ने बिना कोचिंग, बिना किसी विशेष सुविधा के NEET जैसी कठिन परीक्षा की तैयारी की। उसके पास न ब्रांडेड किताबें थीं, न ट्यूशन टीचर, लेकिन उसके पास था अटूट विश्वास और दृढ़ निश्चय।

*’टीम फिफ्टी’ बनी संघर्ष में संबल*

श्रवण के इस कठिन सफर में ‘फिफ्टी विलेजर्स बाड़मेर’, डॉ. भरत सारण और चिमनाराम जाणी जैसे समाजसेवियों का योगदान अविस्मरणीय रहा। इन लोगों ने न केवल श्रवण को पढ़ाई के लिए संसाधन मुहैया कराए, बल्कि उसे भावनात्मक संबल भी दिया। डॉ. भरत सारण और उनकी टीम सैकड़ों वंचित बच्चों को डॉक्टर बनने की राह पर अग्रसर कर चुके हैं। श्रवण उन कई सितारों में से एक है, जिसकी चमक अब पूरे देश को प्रेरित कर रही है।

*भावुक कर देने वाला पल: ‘अब झूठे बर्तनों से पीछा छूटा’*

जब NEET में श्रवण के चयन की खबर उसके पिता को दी गई, तो उनकी आँखों में आँसू थे। उन्होंने बस एक वाक्य कहा: “अब झूठे बर्तनों से तो पीछा छूटा….” यह शब्द उस वर्षों की मेहनत, अपमान और तकलीफ़ का निचोड़ थे, जिसे एक पिता ने अपने बेटे के डॉक्टर बनने के सपने के लिए सहा था। बाद में जब ‘टीम फिफ्टी’ श्रवण के घर पहुँची तो देखा कि वह अपने परिजनों के साथ मिलकर अपनी कच्ची झोपड़ी को सजा रहा था। सपनों का सबसे सच्चा उत्सव वहीं मनाया जा रहा था जहाँ कभी सिर्फ़ संघर्ष था। डॉ. भरत सारण और ‘फिफ्टी विलेजर्स’ की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। इनका यह योगदान न केवल विद्यार्थियों की मदद कर रहा है, बल्कि समाज में यह भरोसा भी जगा रहा है कि सपने सिर्फ़ बड़े घरों में नहीं पलते, वे हर उस दिल में जन्म लेते हैं जहाँ उन्हें उड़ान देने वाला कोई हाथ मिल जाता है।

*प्रेरणा बन गया श्रवण*

श्रवण कुमार आज उन लाखों छात्रों के लिए प्रेरणा है जो कठिन परिस्थितियों को अपनी हार का कारण मान लेते हैं। वह इस बात का प्रमाण है कि अगर संकल्प मज़बूत हो, तो हालात कितने भी विपरीत क्यों न हों, मंज़िल पाई जा सकती है।

*हमें ऐसे और श्रवण चाहिए…*

ऐसे युवाओं की कहानियों को जितना साझा किया जाए, उतनी उम्मीदें जागती हैं। शाबाश श्रवण! तुमने दिखा दिया कि झोपड़ी में भी डॉक्टर बनने का सपना पल सकता है और पूरा भी हो सकता है। न कोई चमचमाती बिल्डिंग, न कोई बड़ी ब्रांडेड कोचिंग, फिर भी यहाँ से हर साल डॉक्टर निकलते हैं। जी हाँ! यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं, बल्कि हक़ीक़त है बाड़मेर की ’50 विलेजर्स’ संस्था की जिसे लोग अब प्यार से डॉक्टरों की फ़ैक्ट्री कहते हैं। इस संस्थान में झुग्गी-झोपड़ी व मज़दूरों के बेटों के डॉक्टर बनने के सपने को साकार किया जाता है।

*संसाधनों का अभाव लेकिन डॉक्टर बनने का है सपना*

गरीब तबके से आने वाले ऐसे होनहार छात्र जिनकी पढ़ाई छूटने वाली थी और कोई मज़दूरी की राह पर चलने वाला था, कुछ सपने थे जो मन में दबे रह गए थे। लेकिन फिर ‘फिफ्टी विलेजर्स’ ने उन छात्रों के सपनों को नई उड़ान दी और अब डॉक्टर बनने में साथ देकर उनका सपना साकार कर रहे हैं। इस संस्थान का उद्देश्य उन छात्रों का सपना पूरा करना है जो पढ़-लिख कर डॉक्टर बनना चाहते हैं, लेकिन उनके पास साधनों का अभाव है।

प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर आरती गोयल ने गौरव सम्मान समारोह का सफल संचालन किया।

Santosh Kumar Garg

Beauro Chief Balotra Rajasthan

Santosh Kumar Garg

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