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विनायकिया भवन से निकला तप आराधको का भव्य वरघोड़ा

ब्यूरो चीफ सन्तोष कुमार गर्ग
जोधपुर 9 अप्रैल 026 विनायकिया भवन से निकला तप आराधको का भव्य वरघोड़ा । भारी संख्या मे श्रद्धालुओं ने लिया आत्मयिता से भाग लिया। पियुषभाई विनायकिया ने एकेले दृढ़ संकल्प से जो उपधान क्रिया की वास्तविक तारीफ लायक — गणिवर्य विश्वरत्नविजय . । तप धर्म वधामणा उत्सव साध्वी क्षीणमोहाश्री 64 वीं व अध्यात्मश्री के 99वीं वर्धमान ओली पुर्णाहुति एवं उपधान तप आराधक पियुष प्रेम सागर विनायकिया के प्रथम उपधान तप पुर्णाहुति निमित्ते तथा वरसी तप आराधक श्राविका रतनीबेन कोठारी के वरसी तप आराधना निमित्ते तप धर्म वधामणा निमित्ते रावतों का वास विनायकिया भवन से ढोल ढमाके के साथ क्रिया भवन तक निकला वरघोड़ा में कई श्रद्धालुओं ने भाग लिया। संघ के दीपक जैन व महावीर विनायकिया ने बताया लुबाजी परिवार व विनायकिया परिवार द्धारा आयोजित तप धर्म वधामणा उत्सव आचार्य तपोरत्नसुरी . म.सा. के शिष्यरत्न गणिवर्य मुनि विश्वरत्नविजय रशिमरत्नविजय साधु साध्वी आदि ठाणा के सानिध्य में साध्वी श्रीणमोहिश्री की 64 मी व साध्वी आध्यात्मश्रेयाश्री 99 मी वर्धमान तप की ओली निमित्ते तथा साधु जैसा चारित्र संयम 47 दिन तक पुर्ण तया पालन कर एक दिन उपवास व एक दिन एक समय निवि आयम्बिल करना ऐसे नियम पूर्वक कठिन आराधना साधना विधि विधान से प्रथम बार उपधान तप करने वाले सुश्रावक उपधान तप आराधक पियुष प्रेम सागर विनायकिया के उपधान तप पुर्णाहुति निमित्ते व ओली आराधक साध्वीवृंद व वर्षितप आराधिका श्राविका रतनी देवी कोठारी का शहर के भितरी क्षैत्र श्रावक धनराज विनायकिया निवास स्थान रावतों का वास विनायकिया भवन से भव्य वरघोड़ा सरे बाजार होते हुए क्रिया भवन पहुचने पर अक्षत गहुँली से तप धर्म वधामणा वथामणा व मार्ग में श्रद्धालुओं का पार्षद मनिष लोढा द्धारा व धवा उपधान समिति द्धारा अभिनंदन पत्र व तपागछ संघ द्धारा स्वागत किया गया इस अवसर पर गणिवर्य विश्वरत्नविजय ने उपधान तप की महिमा मंडण करते कहा इस भौतिकवादी युग में जहां पग-पग पर आकर्षण ओर माया का गहरा रंग छाया हुआ है वहां कोई जीवात्मा उपधान के पथ पर कदम बढ़ाया तो उसकी अनुमोदना भीतर पुण्यदायी होती है। उन्होंने कहा सामुहिक रूप से तप तो सभी करते हैं लेकिन जो पियुषभाई विनायकिया ने एकेले रह कर दृढ़ संकल्प से जो उपधान क्रिया की वास्तविक वो काबिले तारीफ है किसी के मन में ऐसी भावना बनती है तो निश्चित ही यह पिछले भवों के पुण्यों का उदय ही माना जाएगा।

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