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महाकुम्भ में मानवता की उज्जवल छाया: संकट में भी श्रद्धा और सेवा का अद्वितीय उदाहरण

डॉ राम दयाल भाटी की रिपोर्ट
महाकुम्भ के पावन आयोजन में जो दुर्घटना घटी, जो कहानी सामने आई, जो छिप गई अथवा छिपाई, उस काल्पनिकता एवं यथार्थ से कहीं अधिक जो चीज दिखी वो है मानवता का उज्जवल रूप। जन-जन ने अपने मानव होने का प्रमाण प्रस्तुत किया। यदि उदाहरण लिखने बैठ जाऊँगा तो सूची सुदीर्घ हो जाएगी।
स्नान के दौरान फँसे श्रद्धालुओं की संकट की घड़ी में प्रयागराज वासियों ने उनकी सेवा हेतु अपना विशाल हृदय खोलकर जिस प्रकार बिछा दिया, वह शत्-सहस्र बार अभिनन्दन के योग्य है। लोगों ने अपने घर खोल दिए, बिस्तरों के बंडल खोल दिए, निजी शौचालय तक सार्वजनिक व्यवहार में आ गए। यही बंधुत्व, यही औदार्य, यही आतिथ्य परम्परा सनातन संस्कृति का प्राण है।
युवाओं, छात्र-छात्राओं ने अपने सामर्थ्य भर दीन-दुखियों की सेवा की। जलपान कराया, भोजन वितरित किया। नि:शुल्क मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट तक लगाए गए थे। अपने निजी दुपहिया वाहनों को लोगों ने सार्वजनिक परिवहन की तरह उपयोग किया वह भी नि:शुल्क। ताकि भयानक भीड़ से निकल रही जनता को तनिक चैं मिले, सच्चा सम्बल मिले।
धन्य-धन्य है प्रयागराज की धरा! इसके कण-कण में साधु सेवा है, शरणागत को शरण देने की परम्परा है, दीन-दुखियों का हाथ थामने की उदारता है, इसीलिए तो आज भी तीरथराज प्रयाग के नाम से दिग-दिगंत में गुंजायमान है।
मेरी एक परिचित हैं, वह मौनी अमावस्या के दिन भगदड़ वाली जगह पर ही थी और मृत्यु के सन्निकट पहुँच चुकीं थीं। पुलिस वालों ने उन्हें मृत मान कर निकाला किन्तु गंगा मईया की कृपा से वे जीवित थीं। चोटें बहुत आई हैं। बताते-बताते उनकी आँखें भर आती हैं, गला भर्रा जाता है। किन्तु न उनकी श्रद्धा में तृणमात्र की बदला है और न ही उनके विश्वास को कोई ठेस पहुँची है। ठीक होकर वे दोबारा गंगा मईया के दर्शन पूजन आचमन को जाएंगी। क्योंकि उन्हीं की कृपा से वे बच सकी है।
धन्य-धन्य है ऐसी श्रद्धा!
सनातनी भक्ति भी अद्भुत है। जीवन का श्रेय भी परमात्मा का, मृत्यु का उपहार भी परमात्मा का।
बच गए हैं तो गंगा मईया की कृपा से,
मर गए तो कहाँ? गंगा किनारे!
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साभार
(कुम्भ मेले की घटना की निराशा को आशा में बदलता हुआ बच्चे का चित्र ❤️)

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