
महाराष्ट्र संवाददाता सचिन एलिंजे: थायलंड से 110 भिक्षुओं द्वारा लाई गई भगवान गौतम बुद्ध की अस्थियों से भरा कलश ले जाने वाली देश की पहली बौद्ध धम्म पदयात्रा बुधवार को परभणी से 570 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद मुंबई दादर चैत्यभूमी में समाप्त हुई। मार्च करने वाले औपचारिक तरीके से थाईलैंड से कलश लेकर आए और उसे बुधवार को यहां बड़ी संख्या में जुटे बौद्धों के ‘दर्शन’ लाभ के लिए लिए प्रदर्शित किया गया।पैदल मार्च पूरे महाराष्ट्र और अन्य स्थानों से लाखों बौद्ध भक्तों की उपस्थिति में दादर में प्रसिद्ध चैत्यभूमि पर समाप्त हुआ।
महाकरूणी तथागत गौतम बुद्ध के अवशेषों को लेकर चल रहे भंतेजी महाराष्ट्र में 570 किलोमीटर की दूरी तय कर दादर के चैत्यभूमी पहुंचे. जब तक वे चैत्यभूमी पहुंचे, उनमें से कई भंतेजी के पैरों में छाले पड़ गए थे, जबकि कुछ भंतेजी पैरों सें खून बह रहा था। भले ही भंतेजी पैर पर पट्टी बंधी हुई थी, गीले घाव की पीड़ा बनी हुई थी, भंतेजी चेहरे पर अभी भी मुस्कान थी, और थाईलैंड के 110 भिक्षु मुखी भगवान गौतम बुद्ध वाणी अपने अनुयायियों के साथ, महाराष्ट्र से बुद्ध की अवशषों के साथ पदयात्रा की। विगत 17 जनवरी से भिक्षु संघ परभणी से तथागत गौतम बुद्ध की पावन अस्थियों को लेकर मुंबई में चैत्यभूमि की ओर आ गयें। अब तक वे 570 किमी की दूरी तय कर चुके हैं
उन्होंने जब पैदल यात्रा की है, तब भी वे मुंबई में चैत्यभूमि तक पहुँचने के पहले वह सोमवार (6 तारीख) को जब वे नासिक में त्रिरश्मी गुफा के आधार पर बुद्ध स्मारक में रुके थे, तब भंतेगण स्वयं अपने पैरों की देखभाल करते हुए देखे गए थे।
रोजाना 20 किलोमीटर पैदल चलकर नासिक पहुंचे भंतेजी के पैरों में छाले पड़ गए। कई के पैर छिल गए थे तो कुछ के तलवे फट गए थे। कुछ के घाव अब भी गीले थे। फिर भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी और मुखी आशीर्वाद. उन्होंने स्वयं ठहरने के स्थान पर अपने पैरों पर पट्टी बांधी, जबकि कुछ उपासकों ने उनकी सेवा की। श्रद्धेय भंतेजी की सेवा करने की इच्छा व्यक्त करते हुए उपासकों ने यथाशक्ति हे उनकी सेवा की। इस यात्रा के साथ-साथ एक मेडिकल टीम भी है और कई डॉक्टरों ने स्वेच्छा से अपनी सेवाएं दी हैं। जब हम भदंत कोविदाजी, थाईलैंड से बात कि तो उन्होंने हमें कहा भारत बुद्ध की भूमि है। यहां चप्पल पहनकर कैसे चलें, हम भारत में पहिया को गति देने और शांति और अहिंसा का संदेश देने के लिए चल रहे हैं। यह संतोष है कि बुद्ध की भूमि में जीवन सार्थक है। इस खुशी के आगे पैर का दर्द कुछ भी नहीं था! जब हमने देखा पदयात्रा में चलने वाले भंतेजी को किसी प्रकार का सुख नहीं है। वह कहते हैं कि सुबह बुद्ध भूमि आने की संतुष्टि से वे अभिभूत हो गए, जब हमने उन्हें सुविधाएं देने की कोशिश की तो उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया!

दिनांक 14 फरवरी 2023 को दोपहर लगभग 2.30- 3.00 बजे तथागत भगवान बुद्ध के पावन अवशेष घाटकोपर के रमाबाई अंबेडकर नगर आए। बुध्द विहार को रोशनी और फूलों से भी सजाया गया था। लाउड स्पीकर पर भीम-बुद्ध गीत चल रही थी। सभी लोग सफेद कपड़ों में डॉ.बाबासाहेब की प्रतिमा के सामने नमन कर रहे थे। वहां बहुत भीड़ थी.घाटकोपर के लोग थे लेकिन दूर-दूर से लोग उनको अभिवादन करने आये .कई माॅ और पिताजी अपने 4-5 महीने के बच्चों को हाथों में लिए कतारों में खड़े थे.वहां के युवा कतार में खड़े लोगों के लिए पानी और चाय ला रहे थे, वहां यह सुविधा मुहैया कराई गई
थाईलैंड से लाए गए इन तथागतों की पवित्र अस्थियों के साथ वहां के 110 भिक्षुओं ने 17 जनवरी को परभणी से धम्म पदयात्रा शुरू की और आज 15 फरवरी को चैत्यभूमि पर समाप्त हुई।
जिंतूर,देवगांव फाटा, जालना, औरंगाबाद, नाशिक, कल्याण, ठाणे, मुलुंड, घाटकोपर, दादर, ऐसा कुल 570 किमी का सफर था!अनुभव और उत्साह बिल्कुल डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जयंती जैसा माहौल था। हर तरफ सकारात्मक माहौल। उसी माहौल के कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए हैं!
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