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कुढ़न की असाध्य बीमारी: ईर्ष्या नहीं, पुरुषार्थ से बनाएं अपनी पहचान — डॉ. नवीन सिंह
दूसरों की उन्नति से जलना आत्मविकास में सबसे बड़ी बाधा, सकारात्मक सोच और परिश्रम से ही मिलती है सफलता

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती (वेदांत टाइम्स/बस्ती टाइम्स 24)। मनुष्य के जीवन में ईर्ष्या और कुढ़न ऐसी नकारात्मक प्रवृत्तियां हैं, जो उसकी मानसिक शांति, सकारात्मक सोच और व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करती हैं। जब व्यक्ति अपनी स्थिति की तुलना दूसरों से करके स्वयं को कमजोर या पिछड़ा हुआ मानने लगता है, तो उसके भीतर असंतोष उत्पन्न होने लगता है। यदि इस भावना को समय रहते नियंत्रित न किया जाए, तो यह दूसरों की सफलता के प्रति द्वेष और स्वयं की प्रगति में बाधा का कारण बन सकती है। यह विचार डॉ. नवीन सिंह ने व्यक्त करते हुए कहा कि दूसरों की उन्नति से परेशान होने के बजाय स्वयं के विकास के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए।
ईर्ष्या के पीछे छिपा होता है हीनता और असंतोष का भाव
डॉ. नवीन सिंह के अनुसार, अनेक लोग अपनी उपलब्धियों और क्षमताओं का मूल्यांकन स्वयं करने के बजाय दूसरों की सफलता से अपनी तुलना करते रहते हैं। जब उन्हें लगता है कि कोई व्यक्ति उनसे आगे निकल गया है, तो वे अपनी कमियों को दूर करने और आगे बढ़ने का प्रयास करने के बजाय उसके प्रति ईर्ष्या करने लगते हैं। यही मानसिकता धीरे-धीरे कुढ़न का रूप ले लेती है।
उन्होंने कहा कि ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति कई बार यह सोचने लगता है कि यदि आगे बढ़ चुके व्यक्ति को नीचे खींच लिया जाए या उसकी प्रगति रोक दी जाए, तो उसके और दूसरे व्यक्ति के बीच का अंतर समाप्त हो जाएगा। जबकि वास्तविकता यह है कि किसी की सफलता को रोक देने से स्वयं की स्थिति बेहतर नहीं होती। दूसरों को नीचे गिराने की कोशिश करने के बजाय अपनी योग्यता, ज्ञान और कार्यक्षमता बढ़ाना ही सही मार्ग है।
निंदा नहीं, परिश्रम से प्राप्त करें सफलता
डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि दूसरों की प्रशंसा और उन्नति को सहन न कर पाना व्यक्ति के भीतर छिपी महत्वाकांक्षा और असंतोष को दर्शाता है। जब व्यक्ति अपने से अधिक सफल लोगों को देखकर स्वयं को हीन समझने लगता है, तो उसके सामने दो रास्ते होते हैं। पहला, वह ईर्ष्या और निंदा में अपनी ऊर्जा नष्ट करे, और दूसरा, वह अपनी कमियों को पहचानकर मेहनत, अनुशासन और निरंतर अभ्यास के माध्यम से आगे बढ़े।
उन्होंने कहा कि सफलता का वास्तविक मार्ग पुरुषार्थ से होकर गुजरता है। दूसरों की आलोचना करने, उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने या उनकी प्रगति में बाधा डालने से व्यक्ति महान नहीं बनता। इसके विपरीत, अपनी क्षमताओं को निखारने, नई चीजें सीखने और लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है।
दूसरों को आगे बढ़ने से रोकना भी नकारात्मक मानसिकता
उन्होंने यह भी कहा कि ईर्ष्या केवल पीछे रहने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं होती। कई बार आगे बढ़ चुके लोग भी अपने से छोटे या कम अनुभवी व्यक्तियों की प्रगति से असहज महसूस करते हैं। उन्हें आशंका होती है कि यदि दूसरे लोग भी आगे बढ़ गए, तो उनकी विशिष्टता कम हो जाएगी। इसी सोच के कारण वे दूसरों का मार्गदर्शन करने या उन्हें प्रोत्साहित करने के बजाय उनकी राह में बाधाएं उत्पन्न करने लगते हैं।
डॉ. नवीन सिंह के अनुसार, स्वस्थ समाज का निर्माण तभी संभव है, जब लोग एक-दूसरे की सफलता को अपनी प्रेरणा बनाएं। किसी की उपलब्धि से सीखना, उसकी अच्छी बातों को अपनाना और जरूरत पड़ने पर सहयोग करना सकारात्मक व्यक्तित्व की पहचान है।
आत्मसुधार ही कुढ़न से मुक्ति का मार्ग
डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि जीवन में दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी पिछली स्थिति से तुलना करनी चाहिए। व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि उसने समय के साथ कितना ज्ञान अर्जित किया, अपनी क्षमताओं में कितना सुधार किया और अपने लक्ष्यों की दिशा में कितनी प्रगति की है।
उन्होंने संदेश दिया कि ईर्ष्या मनुष्य की ऊर्जा को नकारात्मक दिशा में ले जाती है, जबकि परिश्रम, आत्मविश्वास और सद्भावना उसे उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। दूसरों की सफलता का सम्मान करना, अपनी कमियों को स्वीकार करना और निरंतर बेहतर बनने का प्रयास करना ही स्वस्थ मानसिकता की पहचान है।
निष्कर्षतः, दूसरों को गिराकर आगे बढ़ने की इच्छा छोड़कर स्वयं को ऊंचा उठाने का संकल्प लेना चाहिए। कुढ़न में जीवन की ऊर्जा नष्ट करने के बजाय उसे आत्मविकास, सकारात्मक चिंतन और समाज के कल्याण में लगाना ही सच्चे पुरुषार्थ का मार्ग है।
डॉ. नवीन सिंह

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