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गंगादास गज्जाणी: फिर याद आ रहे हैं गुजरे हुए जमान

राजस्थान हेड डॉ राम दयाल भाटी
देश की आजादी के लिए वैसे तो अनेक लोगों ने अपना सब कुछ त्याग कर अपना जीवन देश को समर्पित कर दिया। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने उस समय तो अंग्रेजों से जंग की और अब वक्त और हालात से जंग कर रहे हैं क्योंकि अपनों के लिए जख्म भरना मुश्किल होता है।
श्री गंगादास गज्जाणी एक ऐसे ही स्वतंत्रता सेनानी हैं जो किशोरावस्था से ही आजादी की लड़ाई में कूद पड़े और जब तक देश आजाद हुआ तब तक राष्ट्र के लिए संघर्ष करते रहे और देश के आजाद होने के बाद ज्यों-ज्यों गंदी राजनीति अपने पांव जमाती गई श्री गज्जाणी पीछे हटते गये। देश के आजाद होने के बाद श्री गज्जाणी को स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते जो पेंशन या जो आर्थिक सुविधा मिलनी चाहिये, नहीं मिली। आज श्री गज्जाणी विपन्नता में जीवन में जीवन व्यतीत कर रहे हैं और उन्हें अफसोस है कि उन्होंने जो कुछ भी राष्ट्र के लिए किया उसका अच्छा प्रतिफल नहीं मिला।
16 मई 1918 को बीकानेर में जन्मे श्री गंगादास गज्जाणी ने बी.के. विद्यालय में उच्च माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा प्राप्त की। आगे पढ़ने की इच्छा होते हुए भी अपने भविष्य को महत्वपूर्ण न मानते हुए श्री गज्जाणी ने देश के भविष्य को प्रमुखता से लिया और आजादी की जंग में उतर आए।
कहते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, इसीलिए श्री गज्जाणी ने स्वतंत्रता सेनानी श्री सुरेन्द्र कुमार शर्मा के सहयोग से ‘हितवर्धक सेवा सदन’ नाम से एक संगठन की स्थापना की जिसमें श्री कन्हैया लाल और श्री मो. फकीर को भी पदाधिकारी बनाया। श्री गज्जाणी बताते हैं कि “महाराजा गंगासिंह जी की गोल्डन जुबिली पर वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के आने का कार्यक्रम था और हमने भी वायसराय के आगे प्रदर्शन करने की ठानी थी किन्तु ये बात राजा को न जाने कैसे मालूम हो गई। मुझे, सुरेन्द्र जी शर्मा तथा कन्हैया लाल को वायसराय के आगमन से 25 दिन पूर्व ही गिरफ्तार कर लिया और साथ ही प्रतिदिन अमानुषिक यातनाएं भी देने लगे।”
श्री गज्जाणी कहते हैं कि “मेरा जीवन ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है।” वे आगे कहते हैं “मैंने वर्षों तक देश की आजादी के लिए सिपाही बनकर संघर्ष किया जिससे उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरी से वंचित रहा। मैंने इतनी भयंकर यातनाएं झेली हैं जिसके कारण आज भी शरीर में वेदना रहती है। देश के लिए इतना कुछ करने वाले व्यक्ति को जो मिलना चाहिये, वो मुझे कुछ नहीं मिला। आज मैं आर्थिक परेशानियों से घिरा हुआ हूं।” श्री गज्जाणी के वाक्य सुनकर भारत के उस कानून और न्याय व्यवस्था पर संदेह होता है जिसपर हमको बहुत नाज है।
श्री गंगादास गज्जाणी ने दिनांक 27.6.89 को विशिष्ट शासन सचिव हर प्रसाद अग्रवाल को एक प्रार्थना पत्र देकर निवेदन किया था कि वे राष्ट्र के मद से स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन स्वीकृत करें। पर उसका कुछ नहीं हुआ। पर श्री गज्जाणी ने हार नहीं मानी और दिनांक 26.9.92 को बीकानेर के तत्कालीन जिला कलेक्टर श्री रामखिलाड़ी मीणा के मार्फत सहायक शासन सचिव, जयपुर को एक पत्र भेजा गया थ

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