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महावीर स्वामी का जीवन त्याग, तपस्या और करुणा का प्रतीक:- बांठिया
महावीर जयंती पर बांठिया ने मंदिरों में की पूजा-अर्चना

ब्यूरो चीफ सन्तोष कुमार गर्ग
बालोतरा।
भारतीय जनता पार्टी प्रदेश काफी समिति सदस्य व श्री चम्पालाल बांठिया चेरिटेबल ट्रस्ट अध्यक्ष गणपत बांठिया ने महावीर स्वामी जन्मोत्सव पर क्षेत्र के विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना कर देश मे अमन चैन व खुशहाली की कामना करते हुए सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लिया।
भारतीय जनता पार्टी प्रदेश काफी समिति सदस्य व श्री चम्पालाल बांठिया चेरिटेबल ट्रस्ट अध्यक्ष गणपत बांठिया क्षेत्र के परालिया स्थित बालाजी मंदिर में पूजा अर्चना कर मंदिर महंत के दर्शन कर वार्ता की।महंत ने बांठिया की कलाई पर रक्षासूत्र बांध कर आशीर्वाद दिया।
वही आयोजित सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेकर ग्रामीणों से चर्चा की।उसके बाद बांठिया ने जयपुर प्रवास जाते समय भगवान महावीर स्वामी मंदिर में पूजा अर्चना कर संसार मे सुख शांति की कामना की।उन्होंने ने कहा कि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था। भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पर सबसे अधिक जोर दिया। त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था। भगवान महावीर ने श्रमण और श्रमणी, श्रावक और श्राविका, सबको लेकर चतुर्विध संघ की स्थापना की। उन्होंने कहा- जो जिस अधिकार का हो, वह उसी वर्ग में आकर सम्यक्त्व पाने के लिए आगे बढ़े। जीवन का लक्ष्य है समता पाना। धीरे-धीरे संघ उन्नति करने लगा। देश के भिन्न-भिन्न भागों में घूमकर भगवान महावीर ने अपना पवित्र संदेश फैलाया।हजारों वर्ष पूर्व भगवान महावीर द्वारा दिए गए सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने मानवता को सिखाया कि सच्ची शक्ति किसी को कष्ट देने में नहीं, बल्कि हर जीव के प्राण प्रेम, दया और संवेदनशीलता रखने में है।त्याग, तप और आत्मसंयम का पर्याय भगवान महावीर का जीवन हमें सिखाता है कि शांति और अहिंसा ही वह मार्ग है, जो विश्व को स्थायी सुख और संतुलन दे सकता है।आज आवश्यकता है कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन उतारें तथा एक करुणामय, अहिंसक और सद्भावपूर्ण समाज के निर्माण में योगदान दें।ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली गणतंत्र के क्षत्रिय कुण्डलपुर में पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के यहाँ तीसरी संतान के रूप में चैत्र शुक्ल तेरस को वर्द्धमान का जन्म हुआ।

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