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अष्टांग योग के सिद्धांत जीवन को देते हैं समग्र दिशा – प्रो. डॉ. नवीन सिंह

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती। भारतीय योग दर्शन की महत्वपूर्ण शाखा अष्टांग योग आज भी जीवन को संतुलित, स्वस्थ और उद्देश्यपूर्ण बनाने का प्रभावी माध्यम माना जाता है। विश्व संवाद परिषद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ, भारत के राष्ट्रीय महासचिव प्रो डॉ नवीन सिंह ने कहा कि अष्टांग योग के सिद्धांत आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
उन्होंने बताया कि अष्टांग योग में आठ अंगों का वर्णन किया गया है, जो व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
अष्टांग योग के आठ अंग
1. यम
यह सामाजिक आचरण के नियम हैं, जिनमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह शामिल हैं।
2. नियम
यह व्यक्तिगत अनुशासन से जुड़े नियम हैं, जैसे शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।
3. आसन
शारीरिक मुद्राएं, जो शरीर को स्वस्थ, लचीला और मजबूत बनाती हैं।
4. प्राणायाम
श्वास-प्रश्वास की विधियां, जो जीवन ऊर्जा को नियंत्रित कर मानसिक शांति प्रदान करती हैं।
5. प्रत्याहार
इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर केंद्रित करने की प्रक्रिया।
6. धारणा
मन को एक बिंदु पर स्थिर करने की अवस्था, जिससे एकाग्रता विकसित होती है।
7. ध्यान
गहन एकाग्रता की स्थिति, जहां मन पूरी तरह शांत और केंद्रित हो जाता है।
8. समाधि
आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च अवस्था, जहां व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करता है।
प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि इन आठों अंगों का नियमित अभ्यास व्यक्ति को न केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाता है, बल्कि मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है।
उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे अष्टांग योग को अपने दैनिक जीवन में अपनाएं, जिससे जीवन अधिक सार्थक और संतुलित बन सके।

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