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शौर्य और स्वाभिमान के प्रतीक महाराणा प्रताप की जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाई गई

शौर्य और स्वाभिमान के प्रतीक महाराणा प्रताप की जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाई गई
बिरसिंहपुर, 9 मई 2026।
मेवाड़ के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती आज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं अमर शहीद उत्तराधिकारी परिवार समिति सतना के जिला अध्यक्ष जितेंद्र सिंह “छोटू” के नेतृत्व में सुतीक्ष्ण आश्रम में राष्ट्रभक्ति और उत्साह के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में महाराणा प्रताप की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पुष्प अर्पित कर उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया गया।
कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने महाराणा प्रताप के जीवन संघर्ष, युद्ध कौशल, राष्ट्रप्रेम और स्वाभिमान पर विस्तार से प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि वरिष्ठ समाजसेवी अभिलाष सिंह ने कहा कि
“महाराणा प्रताप केवल एक राजा नहीं, बल्कि स्वाधीनता और आत्मसम्मान के अमर प्रतीक थे। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी कभी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। घास की रोटी खाना स्वीकार किया, लेकिन पराधीनता स्वीकार नहीं की।”
विशिष्ट अतिथि जितेंद्र सिंह ने कहा कि
“हल्दीघाटी का युद्ध केवल भूमि के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांतों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए लड़ा गया था। प्रताप की गुरिल्ला युद्ध नीति आज भी सैन्य विज्ञान के लिए प्रेरणा का विषय है।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे आश्रम के महंत रामेश्वर दास जी महाराज ने कहा कि
“आज की युवा पीढ़ी को महाराणा प्रताप के जीवन से धैर्य, साहस और संघर्ष की प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने सिद्ध किया कि मजबूत संकल्प के सामने कोई भी कठिनाई बड़ी नहीं होती।”
मुख्य वक्ता कवि हीरा लाल पाण्डेय ने कहा कि
“महाराणा प्रताप का जीवन सामाजिक समरसता और समावेशी नेतृत्व का अद्भुत उदाहरण था। उन्होंने भील समुदाय सहित समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर राष्ट्र रक्षा का कार्य किया।”
कवि सुरेश द्विवेदी ने कहा कि
“महाराणा प्रताप ने युद्धभूमि में भी नैतिक मूल्यों और नारी सम्मान की मर्यादा को सर्वोपरि रखा। खान-ए-खाना की बेगमों को सम्मानपूर्वक वापस भेजना भारतीय संस्कृति की महान परंपरा का उदाहरण है।”
शिवा ग्रामीण विकास संस्थान के अध्यक्ष बृजेन्द्र सिंह ने कहा कि
“महाराणा प्रताप हमारे आदर्श हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सफलता से अधिक महत्वपूर्ण आत्मसम्मान और राष्ट्र की गरिमा होती है। हमें केवल उनकी जयंती मनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ‘राष्ट्र प्रथम’ के उनके विचारों को अपने जीवन में आत्मसात करना चाहिए।”
कार्यक्रम का संचालन जितेंद्र द्विवेदी द्वारा एवं आभार प्रदर्शन राजकुमार दीक्षित द्वारा किया गया।
इस अवसर पर अंकित शुक्ला, पद्माकर पाण्डेय, केशव प्रसाद शुक्ला, भइयन विश्वकर्मा, भोलू सिंह, शंकराचार्य, राजेश श्रीवास्तव, प्रेम सिंह, विनोद सिंह, गोरे सिंह एवं राममणि द्विवेदी सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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