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जनता की किस्मत ताले में, माननीय रिसॉर्ट के उजाले में!

राजस्थान हेड डॉ राम दयाल भाटी
जनता की किस्मत ताले में, माननीय रिसॉर्ट के उजाले में!
वोट हमारा, नोट तुम्हारा: अब रिसॉर्ट संभालेगा शहर का नजारा!
बिल्कुल सटीक और जमीनी हकीकत यह है कि जब लोकतंत्र के सबसे बुनियादी स्तर (स्थानीय निकाय) पर जनमत का सौदा होने लगता है, तो विकास पूरी तरह पटरी से उतर जाता है। त्रिशंकु नतीजों की स्थिति और वंशवाद में खरीद-फरोख्त (हॉर्स ट्रेडिंग) और बाड़ाबंदी जैसी कुरीतियां जनसेवा के संकल्प को व्यापार में बदल देती हैं।
स्थानीय निकाय चुनाव सीधे तौर पर हमारे रोजमर्रा के जीवन (सफाई, पानी, सड़क,स्ट्रीट लाईट) से जुड़े होते हैं। ऐसे में 14 तारीख को आने वाले परिणाम केवल यह नहीं तय करेंगे कि कुर्सी पर कौन बैठेगा?, बल्कि यह भी तय करेंगे कि आने वाले 5 सालों में शहर का विकास होगा या वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ेगा?
जनादेश की नीलामी: जब विकास के पहिए को निगल जाता है ‘धनबल’- स्थानीय निकाय लोकतंत्र की सबसे बुनियादी और पारदर्शी व्यवस्था माने जाते हैं, जहाँ का जनप्रतिनिधि सीधे जनता के सुख-दुख से जुड़ा होता है। लेकिन जब इसी धरातल पर जनमत का खुलेआम सौदा होने लगे, तो चुनाव कराने का मूल औचित्य ही समाप्त हो जाता है।जब किसी चुनाव में जनता का मत विभाजित हो जाता है और किसी भी एक दल को स्पष्ट या पूर्ण बहुमत नहीं मिलता, तब आदर्शों, सिद्धांतों, चुनावी घोषणापत्रों और जनसेवा के बड़े-बड़े वादों की जगह सीधे तौर पर ‘जोड़-तोड़ की राजनीति’ ले लेती है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में त्रिशंकु नतीजों की आहट के साथ ही निर्दलीयों और छोटे दलों को अपने पाले में लाने के लिए भारी-भरकम वित्तीय बोलियाँ लगने की आशंकाएँ गहराने लगी हैं। राजनीतिक गलियारों में शुरू होने वाला ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ (पार्षदों की खरीद-फरोख्त) और ‘बाड़ाबंदी’ का यह खेल लोकतंत्र के चेहरे पर सबसे बड़ा दाग है।
धनबल बनाम जनसेवा: कुर्सी के लिए करोड़ों का दांव: इस प्रलोभन, बाड़ाबंदी और मेयर या चेयरमैन पद के लालच के खेल में अक्सर जीत उसी की होती है जिसके पास अकूत धनबल होता है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का सबसे दर्दनाक और चिंताजनक पहलू यह है कि जब निकाय के अध्यक्ष या मेयर की कुर्सी करोड़ों रुपये के सौदे से खरीदी जाएगी, तो उसका सीधा और घातक असर शहर के विकास कार्यों पर पड़ेगा।एक सीधा सा गणित है—जो व्यक्ति या गुट लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाकर सत्ता के शीर्ष पर पहुँचेगा, उसकी पहली प्राथमिकता शहर की सड़कें सुधारना, सफाई व्यवस्था दुरुस्त करना, पीने के पानी का इंतजाम करना या स्ट्रीट लाइटें लगाना कभी नहीं हो सकती। उसकी सबसे पहली और एकमात्र कोशिश यही रहेगी कि चुनाव जीतने और पार्षदों को खरीदने में लगा हुआ अपना एक-एक रुपया सूद (ब्याज) समेत कैसे वसूला जाए। भ्रष्टाचार का दुष्चक्र और पिसती आम जनता जब तक कुर्सी पर बैठने वाला जनप्रतिनिधि अपनी इस भारी-भरकम वित्तीय भरपाई को पूरा नहीं कर लेता, तब तक क्षेत्र का विकास पूरी तरह से ठप्प पड़ा रहेगा। भ्रष्टाचार के इस दुष्चक्र का सीधा शिकार केवल और केवल उस शहर की आम जनता बनती है, जिसने बदलाव की उम्मीद में धूप में खड़े होकर वोट डाला था। इस सौदेबाजी की राजनीति का परिणाम आने वाले समय में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता हैI
कमीशनखोरी का नया रिकॉर्ड: नगर पालिका या नगर निगम में मिलने वाले टेंडरों और ठेकों में कमीशन का खेल खुलेआम शुरू हो जाता है।
घटिया निर्माण कार्य: जब ठेकेदारों से पहले ही मोटा कमीशन वसूल लिया जाएगा, तो शहर की सड़कों और नालियों का निर्माण बेहद घटिया स्तर का होगा, जो पहली बारिश में ही बह जाएँगी।
दफ्तरों के चक्कर काटते नागरिक: जब जनप्रतिनिधि का ध्यान जनता के बजाय अपनी तिजोरी भरने पर होगा, तो आम नागरिक पानी, बिजली और सफाई जैसी छोटी-छोटी बुनियादी समस्याओं के लिए भी अधिकारियों और पार्षदों के चक्कर काटने को मजबूर हो जाएंगे।
14 तारीख का फैसला: स्थिरता या सौदेबाजी? अब आगामी 14 तारीख को आने वाले परिणाम निश्चित रूप से यह स्पष्ट कर देंगे कि इस निकाय की राजनीति आगे किस दिशा में जाएगी। यह परिणाम केवल हार-जीत का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि शहर के भविष्य का फैसला करेंगे।जनता के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या शहर को एक स्थिर, ईमानदार और विकासोन्मुखी नेतृत्व मिलेगा, या फिर शहर का विकास अगले पांच सालों के लिए सौदेबाजी और स्वार्थ की राजनीति की बलि चढ़ जाएगा? समय आ गया है कि धनबल की इस राजनीति के खिलाफ एक सजग नागरिक समाज उठ खड़ा हो, अन्यथा लोकतंत्र की यह बुनियादी कड़ी केवल कुछ रसूखदारों के व्यापार का जरिया बनकर रह जाएगी।
लेखक: प्रहलादसिंह मार्शल
जिला महासचिव(संगठन) चौथी बार,
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,बीकानेर

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