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तुलसी जयंती समारोह: लोकमंगल, समरसता और भारतीय संस्कृति का त्रिवेणी संगम

वरिष्ठ पत्रकार वैद्यराज संजय पांडेय स्टेट हेड उत्तर प्रदेश
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लखनऊ, 18 अगस्त 2026: लोक संस्कृति, साहित्य और भारतीय सनातन परंपरा के महान संत-कवि गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती आज राजधानी के राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, विकास नगर में अत्यंत हर्षोल्लास, गरिमा और भव्यता के साथ संपन्न हुई। लोकरंग फाउंडेशन एवं अवध भारती संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस पावन समारोह ने तुलसी साहित्य में निहित लोक कल्याणकारी चेतना, सामाजिक समरसता और शाश्वत मानवीय मूल्यों को एक बार फिर जीवंत कर दिया।
दीप प्रज्ज्वलन और सारस्वत वंदना से शुभारंभ
कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मां सरस्वती के तैलचित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। समारोह की गरिमा बढ़ाते हुए विद्यालय की प्रधानाचार्या एवं कार्यक्रम की संयोजक कुसुम वर्मा ने सभी आगत अतिथियों, विद्वानों और साहित्य प्रेमियों का आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया।
इसके पश्चात, सांस्कृतिक संध्या के प्रथम चरण में डॉ. नुपुर त्रिपाठी ने अपनी मधुर स्वर लहरियों से मां वीणावादिनी की वंदना प्रस्तुत कर पूरे सभागार को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ऊर्जा से ओत-प्रोत कर दिया।
मुख्य आतिथ्य एवं विद्वज्जन के विचार: तुलसी साहित्य का लोकपक्ष
समारोह के मुख्य अतिथि, प्रख्यात साहित्यकार प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने छात्राओं और उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी के कृतित्व पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा:
“गोस्वामी तुलसीदास जी केवल एक महान कवि नहीं थे, बल्कि वे भारतीय संस्कृति के प्राण और लोकमंगल के महान संवाहक थे। उनके साहित्य का मुख्य उद्देश्य जन-जन तक धर्म, नैतिकता, लोककल्याण और भारतीय सनातन संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन का संदेश पहुँचाना है।”
विशिष्ट अतिथि डॉ. रामबहादुर मिश्र ने अपने उद्बोधन में तुलसी साहित्य के दार्शनिक और सामाजिक पहलुओं को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के समय में तुलसीदास जी के विचारों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। उन्होंने बल देकर कहा:
“तुलसी साहित्य में निहित लोकमंगल, समरसता, मानवीय मूल्यों एवं भारतीय संस्कृति के संदेश को व्यापक स्तर पर प्रसारित करना ही इस आयोजन की मूल भावना है। रामचरितमानस और उनकी अन्य रचनाएं हमें सिखाती हैं कि किस प्रकार एक आदर्श समाज और मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण जीवन की रचना की जा सकती है।”
लोकरंग फाउंडेशन के अध्यक्ष अतुल कुमार सिंह ने आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जयंती पखवाड़े के अंतर्गत आयोजित इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को गोस्वामी जी के उच्च आदर्शों और विचारों से गहराई से जोड़ना है।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियां: लोकसंस्कृति और तुलसीमय सुरधारा
समारोह का सबसे आकर्षक और मनमोहक हिस्सा विद्यालय की मेधावी छात्राओं द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रम रहा। छात्राओं ने अपनी कला और गायन से उपस्थित सभी लोगों का मन मोह लिया:
लोकगीत एवं पद गायन: छात्राओं—पलक्षी दुबे, कृति त्रिपाठी, प्रकृति वर्मा तथा शैली पांडे—ने गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रसिद्ध रचना “कहां के पथिक कहां कीन्हा है गमनवा” का सस्वर गायन कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
दोहावली प्रतियोगिता: छात्राओं ने पाठ्यक्रम में संकलित दोहावली को एक अत्यंत रोचक और आकर्षक ‘सवाल-जवाब’ अंदाज़ में प्रस्तुत किया, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सावन गीत: इस पावन बेला में छात्राओं ने पारंपरिक सावन गीत “झुला धीरे से झुलावो सुकुमारी सियाराम है” गाकर ऋतुराज सावन और राम-सिया के प्रेम व लोकसंस्कृति के अनूठे मेल को मंच पर जीवंत कर दिया।
सहभागिता एवं उपस्थिति
इस गरिमामयी आयोजन में साहित्य, संस्कृति, लोककला और शिक्षा जगत से जुड़े अनेक गणमान्य विद्वान एवं नागरिक उपस्थित रहे। विद्यालय की शिक्षिकाओं—बबिता वर्मा, शबनम नकवी, दीपा साहू, प्रियंका सिंह और कंचन सिंह—ने पूरे कार्यक्रम के संचालन और व्यवस्था में सक्रिय सहभागिता निभाई।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए भविष्य में भी ऐसे आयोजनों के माध्यम से युवा पीढ़ी में भारतीय संस्कृति और तुलसी साहित्य के मूल्यों को सिंचित करते रहने का संकल्प लिया।
आयोजक:
लोकरंग फाउंडेशन
अवध भारती संस्थान


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