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महाराणा प्रताप: स्वाभिमान, शौर्य और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक – डॉ. नवीन सिंह
मातृभूमि की रक्षा के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले वीर योद्धा को श्रद्धापूर्वक नमन

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती। भारतीय इतिहास में वीरता, त्याग और आत्मसम्मान की मिसाल माने जाने वाले महाराणा प्रताप का जीवन आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। उन्होंने मातृभूमि, स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन संघर्ष में बिताया और कभी भी विदेशी सत्ता के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। उनके पिता महाराणा उदय सिंह द्वितीय तथा माता रानी जयवंता बाई थीं। वे मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के वीर शासक थे। बचपन से ही महाराणा प्रताप साहसी, स्वाभिमानी और युद्धकला में निपुण थे।
इतिहासकारों के अनुसार उस समय अधिकांश राजाओं ने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी, लेकिन महाराणा प्रताप ने स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को सर्वोपरि मानते हुए समझौता करने से इनकार कर दिया। सन 1576 में हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध महाराणा प्रताप और मुगल सेना के बीच लड़ा गया, जिसमें उन्होंने अद्भुत वीरता का परिचय दिया।
इस युद्ध में उनके प्रिय घोड़े चेतक की स्वामीभक्ति और वीरता भी इतिहास में अमर हो गई। कठिन परिस्थितियों, जंगलों में जीवन और अभावों के बावजूद महाराणा प्रताप ने कभी हार नहीं मानी। परिवार सहित वन-वन भटकने और घास की रोटियां खाने जैसी कठिनाइयों का सामना करने के बाद भी उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया।
बाद में अपने साहस और रणनीति के बल पर उन्होंने मेवाड़ के अधिकांश क्षेत्रों को पुनः स्वतंत्र करा लिया। 19 जनवरी 1597 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनका जीवन आज भी राष्ट्रभक्ति, त्याग और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है।
प्रो. डॉ. नवीन सिंह, राष्ट्रीय महासचिव, विश्व संवाद परिषद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ, भारत ने कहा कि महाराणा प्रताप का जीवन हमें यह संदेश देता है कि आत्मसम्मान और स्वतंत्रता से बड़ा कोई धन नहीं होता।
उन्होंने महाराणा प्रताप के प्रेरणादायक संदेश को उद्धृत करते हुए कहा—
“मेवाड़ की धरती पर घास भले उग आए, लेकिन मेवाड़ का सिर कभी झुक नहीं सकता।” 🚩

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