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कामवासना का सात्विक उपयोग : सृजन से आध्यात्मिक उन्नति तक — प्रो. डॉ. नवीन सिंह

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती।
कामवासना (Sexual Energy) को भारतीय दर्शन और मनोविज्ञान में अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा माना गया है। सात्विक दृष्टिकोण के अनुसार इसका अर्थ केवल शारीरिक आकर्षण या भोग नहीं, बल्कि शुद्धता, संतुलन और ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन से है। इसी विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए विश्व संवाद परिषद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ, भारत के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि काम ऊर्जा का सही एवं सात्विक उपयोग व्यक्ति को मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से उन्नत बना सकता है।
उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति में कामवासना को जीवन की प्राकृतिक शक्ति माना गया है, जिसका उद्देश्य केवल इंद्रिय सुख नहीं, बल्कि सृष्टि की निरंतरता और श्रेष्ठ संतति का निर्माण है। सात्विक दृष्टि में दांपत्य संबंध एक प्रकार का “यज्ञ” है, जहाँ पति-पत्नी आपसी प्रेम, विश्वास और समर्पण के माध्यम से समाज को संस्कारी नई पीढ़ी प्रदान करते हैं।
प्रो. डॉ. सिंह ने कहा कि जब कामवासना स्वार्थ और केवल शरीर के आकर्षण से ऊपर उठती है, तब वह प्रेम और आत्मीयता का रूप ले लेती है। इससे पति-पत्नी के बीच मानसिक जुड़ाव, मित्रता और परस्पर सम्मान की भावना मजबूत होती है तथा अहंकार समाप्त होकर समर्पण की भावना विकसित होती है।
योग शास्त्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि संयमित और नियंत्रित काम ऊर्जा ‘ओज’ एवं ‘मेधा’ में परिवर्तित हो सकती है। ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ दमन नहीं, बल्कि ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग है। इससे मानसिक एकाग्रता, बौद्धिक क्षमता और आत्मबल में वृद्धि होती है।
उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास में अनेक महान कलाकारों, साहित्यकारों और विचारकों ने अपनी आंतरिक ऊर्जा को संगीत, लेखन, चित्रकला और अन्य रचनात्मक कार्यों में परिवर्तित कर समाज को नई दिशा दी। जब व्यक्ति अपनी काम ऊर्जा को सृजनात्मकता में रूपांतरित करता है, तब वह सात्विक उपयोग की श्रेणी में आता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से उन्होंने कहा कि कामवासना मूलाधार चक्र की ऊर्जा मानी जाती है। साधना, योग और ध्यान के माध्यम से जब यह ऊर्जा सहस्रार चक्र की ओर प्रवाहित होती है, तब आत्म-साक्षात्कार और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खुलता है। सात्विक जीवन का उद्देश्य वासना को उपासना में बदलना है।
अंत में प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने युवाओं से आह्वान किया कि वे काम ऊर्जा को केवल भोग की दृष्टि से न देखें, बल्कि इसे आत्म-विकास, सृजन और समाज कल्याण की दिशा में सकारात्मक रूप से प्रयोग करें।

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