
🖋️ कविता: डर
✍️ लेखिका: अंजली पांडेय
मुझको डर लगता है…
हाँ, मुझको डर लगता है।
लड़की बनकर आने से,
दुनिया के पैमानों से,
लोगों के उन तानों से —
मुझको डर लगता है।
हाँ, मुझको डर लगता है।
इस उम्र में शबाब के आने से,
फिर नज़रों के टकराने से,
फिर मिलकर बिछड़ जाने से —
मुझको डर लगता है।
हाँ, मुझको डर लगता है।
नापसंद शख़्स को अपनाने से,
बेमन का रिश्ता निभाने से,
ता-उम्र क़ैद हो जाने से —
मुझको डर लगता है।
हाँ, मुझको डर लगता है…
बहुत डर लगता है।
यह कविता समाज में एक लड़की के मन में छिपे डर, असुरक्षा और मजबूरियों को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करती है। लेखिका अंजली पांडेय ने शब्दों के माध्यम से नारी मन की पीड़ा और उसके संघर्ष को भावुकता के साथ उकेरा है।
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