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बस्ती में सड़कों का बुरा हाल, नेता फॉर्च्यूनर में मस्त — जनता गड्ढों में पस्त

गड्ढे, जलभराव और टूटी सड़कों से त्रस्त हैं लोग, लेकिन जनप्रतिनिधि बने मूकदर्शक

ब्यूरो चीफ सचिन कुमार कसौधन

बस्ती – शहर की सड़कें आज अपने बदहाली पर आंसू बहा रही हैं, लेकिन उन्हें सुधारने वाले जनप्रतिनिधि शायद एसी फॉर्च्यूनर की खिड़कियों से बाहर झांकना भूल चुके हैं। आम जनता रोज़ गड्ढों में गिरती है, बारिश के बाद जलजमाव से जूझती है, लेकिन नेताओं को न कोई शर्म है, न ज़िम्मेदारी का अहसास। शहर के बड़ेवन ओवरब्रिज के नीचे, खासकर यातायात प्रभारी कार्यालय के सामने की सड़क, बस्ती की दुर्दशा की सबसे बड़ी मिसाल बन चुकी है। हर बारिश में यह इलाका झील में तब्दील हो जाता है। सड़क की हालत इतनी खराब है कि दुपहिया वाहन फिसलते हैं, पैदल चलना तक मुश्किल हो जाता है, लेकिन इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस सड़क से रोजाना जिले के बड़े नेता गुजरते हैं, जिनमें सत्ता पक्ष और विपक्ष — दोनों के जनप्रतिनिधि शामिल हैं। इतना ही नहीं, मात्र 50 मीटर की दूरी पर ही एक वर्तमान विधान परिषद सदस्य (MLC) का आवास स्थित है, फिर भी सड़क पर कीचड़ और पानी का कब्ज़ा बना हुआ है। स्थानीय निवासी राजेश तिवारी कहते हैं, “हर चुनाव में विकास के बड़े-बड़े वादे होते हैं, लेकिन हकीकत में हमें गड्ढों और जलजमाव के बीच ही जीना पड़ता है। क्या यही है स्मार्ट सिटी का सपना?”

जनता में नाराज़गी साफ है, लेकिन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और भी ज्यादा खतरनाक है। ऐसा लगता है कि चुनाव जीतने के बाद जनता की आवाज़ नेता सुनना ही नहीं चाहते, और विकास केवल भाषणों तक सीमित होकर रह गया है। अब सवाल यह है कि क्या नेताओं की गाड़ियों के एसी कांच कभी उन झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाली आंखों से टकराएंगे, जिनकी ज़िंदगी इन गड्ढों के बीच उलझ गई है? क्या लोकतंत्र का मतलब केवल वोट मांगना और फिर भूल जाना ही रह गया है? बस्ती की सड़कों का यह हाल सिर्फ एक बस्ती की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी की इबारत है। और जब तक जनता अपनी आवाज़ को मजबूती से नहीं उठाएगी, तब तक नेता फॉर्च्यूनर में चलते रहेंगे — और हम गड्ढों में गिरते रहेंगे।

Sachin Kumar Kasudhan

Beauro Chief (Basti)

Sachin Kumar Kasudhan

Beauro Chief (Basti)

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