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बालोतरा में पहली बार हुआ सक्कुत्थुई विद्याकल्प अनुष्ठान, साध्वी मंगलप्रज्ञा ने बताई जैन परंपरा की महत्ता

ब्यूरो चीफ सन्तोष कुमार गर्ग
बालोतरा, 7 सितंबर 2026।
तेरापंथ भवन बालोतरा के अमृत सभागार में प्रोफेसर साध्वीश्री मंगलप्रज्ञा जी के सान्निध्य में “सक्कुत्थुई विद्याकल्प अनुष्ठान” का भव्य आयोजन किया गया। अनुष्ठान में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। बालोतरा में पहली बार आयोजित इस विशेष अनुष्ठान को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।
तेरापंथ सभा मंत्री मोहन बाफ़ना ने बताया कि अनुष्ठान के दौरान विशाल परिषद को संबोधित करते हुए प्रोफेसर साध्वीश्री मंगलप्रज्ञा जी ने सक्कुत्थुई को जैन परंपरा की अनमोल एवं महत्वपूर्ण विरासत बताया। उन्होंने कहा कि जब हमारा संबंध अरिहंतों के साथ जुड़ता है तो वह आध्यात्मिक रूप से फलदायी बनता है। जैन आगमों में भी ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख मिलता है, जहां शक्तिशाली अरहंत स्तवन के माध्यम से समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त हुआ।
साध्वीश्री ने कहा कि नमोत्थुण के अनेक आध्यात्मिक प्रयोग किए जा सकते हैं। उन्होंने सक्कुत्थुई विद्याकल्प अनुष्ठान को प्रभावशाली साधना बताते हुए कहा कि इसके माध्यम से साधक अरिहंत परमात्मा के साथ आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। साधना के माध्यम से प्राप्त आध्यात्मिक ऊर्जा साधक को विशेष शक्ति और आत्मविश्वास का अनुभव करा सकती है।
उन्होंने आधुनिक उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार आज विज्ञान के युग में अनेक उपकरणों को रिमोट के माध्यम से संचालित किया जाता है, उसी प्रकार साधना के माध्यम से अरिहंत भगवान की आध्यात्मिक तरंगों से जुड़ने का प्रयास किया जा सकता है। यह साधना व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर आध्यात्मिक सुरक्षा कवच का निर्माण करने में सहायक बन सकती है।
साध्वी मंगलप्रज्ञा जी ने कहा कि सक्कुत्थुई जैन परंपरा की महत्वपूर्ण विरासत है और समाज को इसका आध्यात्मिक लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन की राह में अनेक प्रकार के व्यवधान और समस्याएं आती रहती हैं। समस्याओं से घिरा व्यक्ति अशांत और निराश हो जाता है। ऐसे समय में आध्यात्मिक अनुष्ठान प्रकाश-पुंज की तरह सही दिशा दिखाने और निराश व्यक्ति को आश्वस्त करने का कार्य करते हैं।
उन्होंने कहा कि साधना आस्था और समर्पण के साथ की जानी चाहिए। अरिहंतों की विशेषताएं व्यक्ति के लिए आदर्श एवं मार्गदर्शक का कार्य करती हैं और जीवन में सकारात्मकता एवं आत्मबल का संचार करती हैं।
अनुष्ठान में श्रावक-श्राविकाओं ने पंच परमेष्ठी के रंगों से संबंधित परिधानों में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम से पूर्व साध्वी सुदर्शन प्रभा एवं साध्वी डॉ. राजुल प्रभा ने मंगल संगान प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के दौरान वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा और श्रद्धा से ओतप्रोत रहा। श्रद्धालुओं ने इस विशेष अनुष्ठान को जैन परंपरा से जुड़ने और आत्मिक शांति प्राप्त करने का महत्वपूर्ण अवसर बताया।

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