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गड़े मुद्दे

 

गड़े मुद्दे

लेखिका: अंजली पांडेय

आज मैं आपसे एक ऐसे खास मुद्दे पर बात करना चाहती हूं, जिस पर अक्सर किसी की नजर नहीं जाती या यूं कहें कि ज्यादातर लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। आखिर क्यों समाज स्त्री को दबाकर रखना चाहता है?

एक बड़े लेखक ने कहा था कि धर्म को मानने वालों में सबसे ज्यादा महिलाएं मिलती हैं, लेकिन यही वह धर्म है जिसने उनसे उनका अस्तित्व छीन लिया। मैं भी इस बात से सहमत हूं।

“अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना” वाली कहावत शायद तब बनी होगी, जब किसी ने देखा होगा कि एक महिला ने देवी बनने के चक्कर में अपनी आजादी खो दी। खुद को अन्नपूर्णा देवी बनाने के प्रयास में वह चूल्हे-चौके तक सिमट गई, लक्ष्मी बनने के प्रयास में अपना सारा धन दूसरों पर खर्च कर खुद खाली हो गई, सरस्वती बनने के चक्कर में उसने अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी। सौम्य रूप धारण करने के प्रयास में उसने अपनी तर्क शक्ति खो दी और ममता के नाम पर सहनशीलता को अपनी मजबूरी बना लिया।

“पुरुषों ने स्त्रियों को देवी तो बनाया, लेकिन कभी इंसान नहीं बनने दिया।”

यह सिर्फ भारत की बात नहीं है, बल्कि पूरे विश्व के इतिहास और वर्तमान को देखें तो कहीं कम तो कहीं ज्यादा, लेकिन यह स्थिति हर जगह दिखाई देती है।

क्या कोई ऐसा धर्म है जहां स्त्री को सिर्फ एक इंसान के रूप में देखा गया हो और उस पर ‘इज्जत’ का बोझ न डाला गया हो? हर जगह स्त्री को अपनी आजादी, सम्मान और सपनों के लिए संघर्ष करना पड़ा है।

जब एक स्त्री को सबके बाद खाना खाना पड़े, पति का जूठा खाना पड़े, तो वह कैसी अन्नपूर्णा देवी?

जब पढ़ाई के लिए उसे पिता, भाई या पति से अनुमति लेनी पड़े, तो कैसी सरस्वती देवी?

जब पैसे के लिए उसे दूसरों पर निर्भर रहना पड़े, तो कैसी लक्ष्मी देवी?

जब वह अपनी सोच से निर्णय न ले सके, तो कैसी गायत्री देवी?

जब वह अपने अधिकार के लिए लड़ ही न सके, तो कैसी दुर्गा?

और जब वह अन्याय के खिलाफ आवाज न उठा सके, तो कैसी चामुंडा?

एक महान महिला ने कहा था कि जब प्रकृति ने हमें इस दुनिया में भेजा, तो लड़का और लड़की दोनों को समान रूप से जन्म दिया। फिर यह ‘दुपट्टा’ और बंधन केवल लड़कियों के हिस्से में क्यों आया? यह समाज की देन है।

पुरुष प्रधान समाज में जब पुरुष अपनी कमजोरियों पर नियंत्रण नहीं रख पाए, तो उन्होंने स्त्री को ही ढंक देना सही समझा। ठीक वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति अपने चेहरे के दाग को देखकर आईना तोड़ देता है या उसे ढंक देता है।

आप ही सोचिए, दुनिया में अनेक धर्म और समुदाय हैं, जो अलग-अलग उद्देश्यों के लिए काम करते हैं। लेकिन क्या कोई ऐसा बड़ा समूह है जो केवल स्त्री अधिकारों और सुरक्षा की बात करता हो? शायद नहीं। क्योंकि यदि स्त्री धर्म और परंपराओं के जाल में न फंसे, तो वह हर क्षेत्र में पुरुषों से आगे निकल सकती है।

एक सवाल आपसे—अगर कोई व्यक्ति गलत करता है, तो सजा किसे मिलनी चाहिए? उसी व्यक्ति को या उसके पूरे परिवार को?

फिर जब किसी लड़की के साथ कोई गलत करता है, तो प्रतिबंध किस पर लगना चाहिए—लड़के पर या लड़की पर?

लेकिन यहां भी समाज ने चालाकी से गलती का बोझ स्त्री पर ही डाल दिया।

यही कारण है कि आज भी पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर और मजबूत महिलाएं अक्सर अपने संघर्ष के समय अकेली नजर आती हैं। वजह यह नहीं कि वे अलग हैं, बल्कि इसलिए कि बहुत से पुरुष उन्हें अपने से आगे बढ़ते देख नहीं पाते।

ऐसी महिलाओं को अक्सर “चरित्रहीन”, “निर्लज्ज” जैसे शब्दों से अपमानित किया जाता है, क्योंकि वे उन बंधनों से मुक्त हो चुकी होती हैं और अपने क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रही होती हैं।

अब बात “पति परमेश्वर” की—यह अवधारणा समझ से परे है।

अगर एक साइकिल के दो पहिए बराबर मेहनत करते हैं, तो क्या आगे वाला पहिया ज्यादा पूजनीय हो जाता है और पीछे वाला कम?

नहीं। दोनों का योगदान बराबर है, इसलिए दोनों का सम्मान भी बराबर होना चाहिए।

जैसे गुलाब को फूलों का राजा इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसमें विशेष गुण हैं, न कि सिर्फ इसलिए कि समाज ने उसे राजा घोषित कर दिया। उसी तरह जो व्यक्ति योग्य है, वही सम्मान का पात्र है—चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।

अगर “परमेश्वर” की अवधारणा को मानना है, तो पत्नी को भी “परमेश्वरी” कहा जाना चाहिए। लेकिन सबसे बेहतर यही होगा कि दोनों को सिर्फ इंसान का दर्जा दिया जाए।

निष्कर्ष:

समाज को अब स्त्री को देवी नहीं, बल्कि एक समान अधिकारों वाली इंसान के रूप में स्वीकार करना होगा। यही सच्ची प्रगति और समानता की दिशा में सबसे बड़ा कदम होगा।

Viyasmani Tripaathi

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