कहानियां

स्टोरी नाम: खामोश आपबीती

 

लेखिका: अंजलि पांडेय

हमारे उत्तर प्रदेश में एक कहावत बहुत प्रचलित है— “दूर के ढोल सुहावने”। यानी जब तक हम किसी व्यक्ति को दूर से जानते हैं, वह हमें बहुत अच्छा लगता है, लेकिन जब उसके साथ रहने का मौका मिलता है, तब उसकी असलियत सामने आती है।

आज मैं आपको एक लड़की की कहानी बताने जा रही हूं, जिसका नाम सावन था।

सावन की बातें सुनकर मुझे समझ आया कि “बेबसी” किसे कहते हैं।

हम सभी जानते हैं कि सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं की कितनी बड़ी भीड़ है। सावन भी इसी भीड़ का एक हिस्सा थी। वह कुछ महीनों के लिए अपने एक रिश्तेदार के घर गई थी, जहां वह पढ़ाई करने के लिए रुकी थी। लेकिन वह वहां सिर्फ तीन महीने ही रह सकी और फिर वापस अपने घर लौट गई।

इन तीन महीनों में उसके साथ क्या हुआ, यह उसने कभी अपने घरवालों को नहीं बताया।

सावन ने मुझे बताया कि उसके रिश्तेदार उसे हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करते थे। कई बार तो वे सीधे तौर पर उसे अपमानित भी करते थे। यहां तक कि उनके घर में काम करने वाली नौकरानी के सामने भी वे सावन के साथ उससे भी बुरा व्यवहार करते थे।

उन्हें लगता था कि सावन गांव से आई है, इसलिए उसे शहर की महंगी चीजों की समझ नहीं होगी या वह उनका इस्तेमाल नहीं कर पाएगी। इसी बात को लेकर वे बार-बार उसे ताने देते थे और उसे “देहाती” महसूस कराते थे।

सावन ने यह भी बताया कि जब घर में कुछ अच्छा बनता था, तो वे लोग खुद ही खा लेते थे और कभी उससे नहीं पूछते थे कि वह भी खाना चाहती है या नहीं।

जब उसके घर से फोन आता, तो वे लोग बात करने से बचते थे। और अगर बात करनी भी पड़ती, तो उसके परिवार के सामने बहुत अच्छा बनने का दिखावा करते थे।

जब सावन के घर से उसके लिए कुछ सामान आता, तो रिश्तेदार उसे अजीब नजरों से देखते थे, मानो उन्हें यह सब पसंद न हो।

यह सारा व्यवहार इसलिए था क्योंकि वे उसकी पढ़ाई का खर्च उठा रहे थे। वे हर छोटी-बड़ी बात पर उसे टोकते थे—

“यहां मत बैठो”, “ऐसे मत बैठो”, “लाइट बंद करो”, “पंखा बंद करो”।

यहां तक कि जब बिजली चली जाती, तब भी उसे इन्वर्टर से पंखा चलाने की अनुमति नहीं दी जाती थी।

सावन को अपने रिश्तेदारों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं था।

उसका कोर्स 6 महीने का था, लेकिन रिश्तेदारों ने कोचिंग से बात करके और बहाने बनाकर उसे 3 महीने में ही घर भेज दिया।

मैं भी उसी कोचिंग में पढ़ती थी जहां सावन पढ़ती थी। वह ज्यादा किसी से बात नहीं करती थी, लेकिन कभी-कभी मुझसे बात कर लेती थी। हम दोनों मेट्रो से आते-जाते थे।

एक दिन मैंने उसे मेट्रो की सीढ़ियों पर बैठे देखा। मैंने पूछा, “तुम यहां क्यों बैठी हो?”

उसने आंसू पोंछते हुए कहा, “बस ऐसे ही…”

मेरा मन नहीं माना, तो मैं उसके पास बैठ गई और बार-बार पूछने पर उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया और रोते हुए अपनी पूरी कहानी सुना दी।

उसने कहा कि जो कुछ उसने बताया है, वह पूरी सच्चाई नहीं है—असल में उससे भी ज्यादा बातें हैं, जिन्हें वह याद भी नहीं करना चाहती। उसका दिमाग समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहे और क्या छुपाए।

सावन की बातें सुनकर मुझे एहसास हुआ कि बेबसी क्या होती है।

इसीलिए मैं आपसे कहना चाहती हूं—

असली रईस वह नहीं होते जिनके पास सिर्फ दौलत होती है, बल्कि रईस वह होते हैं जिनके पास तहजीब, इंसानियत और दूसरों के प्रति सम्मान होता है।

Viyasmani Tripaathi

Cheif editor Mobile no 9795441508/7905219162

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