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महाराजा गंगा सिंह: 19 साल की उम्र में अकाल से जंग और 20 साल में चीन के युद्ध में दिखाया साहस

राजस्थान हेड डॉ राम दयाल भाटी
बीकानेर।
बीकानेर रियासत के महान शासक महाराजा गंगा सिंह ने बहुत कम उम्र में ही अपने साहस, नेतृत्व क्षमता और जनता के प्रति समर्पण का ऐसा उदाहरण पेश किया, जिसकी मिसाल इतिहास में कम ही देखने को मिलती है। युवावस्था में ही उन्होंने न केवल भयंकर अकाल से अपनी प्रजा को बचाने के लिए संघर्ष किया, बल्कि विदेश में युद्ध के मैदान में भी अपनी वीरता का परिचय दिया।
19 साल की उम्र में ‘छप्पनिया अकाल’ से मुकाबला
साल छप्पनिया अकाल (1899-1900) के दौरान राजपूताना क्षेत्र, विशेष रूप से बीकानेर सहित पूरे राजस्थान में भीषण सूखा और भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई थी। उस समय महाराजा गंगा सिंह की उम्र मात्र 19 वर्ष थी और उन्हें राजा के रूप में पूर्ण अधिकार मिले अभी एक वर्ष ही हुआ था।
इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी आपदा किसी भी शासक के लिए चुनौतीपूर्ण होती, लेकिन युवा महाराजा ने अद्भुत साहस और समझदारी का परिचय दिया। उन्होंने महलों में बैठकर आदेश देने के बजाय खुद मैदान में उतरकर हालात का जायजा लिया।
तपती धूप में घोड़े और ऊंट पर सवार होकर वे गांव-गांव पहुंचे और राहत कार्यों की निगरानी की।
महाराजा ने राहत शिविर खुलवाए, कुएं खुदवाए, मुफ्त अनाज वितरण की व्यवस्था करवाई और पशुओं के लिए चारे का प्रबंध कराया। उनकी सक्रियता और संवेदनशीलता को देखकर अंग्रेज अधिकारी भी प्रभावित हुए। अकाल के दौरान उत्कृष्ट कार्यों के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कैसर-ए-हिंद पदक से सम्मानित किया।
20 साल की उम्र में चीन के युद्ध में नेतृत्व
अकाल की इस चुनौती के बाद वर्ष 1900 में बॉक्सर विद्रोह के कारण चीन में युद्ध की स्थिति बन गई। उस समय 20 वर्षीय महाराजा गंगा सिंह ने अपनी प्रसिद्ध ऊंटों की सेना गंगा रिसाला के साथ ब्रिटिश सेना की सहायता के लिए चीन जाने का निर्णय लिया।
विशेष बात यह रही कि उन्होंने केवल सेना भेजने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि स्वयं युद्ध के मैदान में जाकर अपनी सेना का नेतृत्व किया। उस दौर में विदेश जाकर युद्ध में हिस्सा लेने वाले भारतीय राजाओं में उनका नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है।
युवावस्था में ही दिखा महान नेतृत्व
इतिहास के ये दोनों प्रसंग इस बात को साबित करते हैं कि महाराजा गंगा सिंह ने अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में ही साहस, दूरदर्शिता और जनसेवा का असाधारण उदाहरण प्रस्तुत किया। यही कारण है कि उन्हें बीकानेर के सबसे प्रभावशाली और दूरदर्शी शासकों में गिना जाता है।

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