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पंकज गहलोत बने उप महापौर, 24 घंटे में ही अनिल कल्ला को पहली राजनीतिक परीक्षा में झटका
बहुमत के बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी को 38 वोट, भाजपा ने 40 वोट लेकर पलटा खेल

राजस्थान हेड डॉ राम दयाल भाटी
MNPRS दखल, सबसे पहले
बीकानेर नगर निगम की राजनीति में महापौर चुनाव के ठीक 24 घंटे बाद ही बड़ा उलटफेर हो गया। भाजपा के पंकज गहलोत ने कांग्रेस की नसीम बानो को दो वोट से हराकर उप महापौर की कुर्सी पर कब्जा जमा लिया। 80 सदस्यीय निगम में गहलोत को 40 वोट मिले, जबकि नसीम बानो 38 वोट ही हासिल कर सकीं। एक मत निरस्त हुआ और एक पार्षद ने नोटा का विकल्प चुना।
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि जिस कांग्रेस ने 50 पार्षदों के बहुमत के साथ एक दिन पहले अनिल कल्ला को महापौर बना दिया, उसी कांग्रेस का प्रत्याशी उप महापौर चुनाव में 38 वोट पर कैसे सिमट गया? बहुमत के बावजूद चार वोट कम रह जाना महज चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर की राजनीतिक स्थिति पर सवाल खड़े करता है।
महापौर की जीत के 24 घंटे बाद ही पहला झटका
अनिल कल्ला ने महापौर का चुनाव कांग्रेस के 42 पार्षदों के बहुमत के सहारे जीता था। भाजपा के पास 27 पार्षद थे, जबकि 10 निर्दलीय और एक आरएलपी पार्षद निर्वाचित हुए थे।
महापौर चुनाव में नवरत्न डागा के नामांकन वापस लेने के बाद कांग्रेस के सामने कोई दूसरा उम्मीदवार नहीं रहा और कल्ला निर्विरोध राजनीतिक चुनौती से आगे निकल गए। लेकिन अगले ही दिन उप महापौर चुनाव ने तस्वीर बदल दी।
कांग्रेस ने नसीम बानो को मैदान में उतारा। नामांकन से पहले पार्टी के भीतर कई नामों की चर्चा और छह दावेदारियां सामने आई। बाद में दावेदारों ने नाम वापस लेकर एक प्रत्याशी पर सहमति दिखाई, लेकिन मतदान के नतीजे ने बता दिया कि कागज पर बनी सहमति और मतदान कक्ष के भीतर की स्थिति एक जैसी नहीं थी।
सवाल कल्ला की पकड़ पर भी
यह परिणाम अब सीधे तौर पर अनिल कल्ला के नेतृत्व और पार्षदों के बीच उनकी पकड़ को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। महापौर बनने के बाद उनकी पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा अगले ही दिन सामने आ गई और उसी परीक्षा में कांग्रेस अपना उप महापौर नहीं बना सकी।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि कांग्रेस के कितने पार्षदों ने क्रॉस वोटिंग की या किस खेमे के पार्षदों ने भाजपा का साथ दिया। लेकिन इतना जरूर है कि 42 के बहुमत वाली कांग्रेस के प्रत्याशी को 38 वोट मिलना और 27 पार्षदों वाली भाजपा के प्रत्याशी का 40 वोट तक पहुंच जाना निगम की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत है।
जेठानंद व्यास का दांव सफल
उप महापौर चुनाव में भाजपा विधायक जेठानंद व्यास की सक्रियता भी चर्चा में रही। भाजपा ने महापौर का चुनाव गंवाने के अगले ही दिन उप महापौर पद हासिल कर लिया। इससे भाजपा ने यह संदेश जरूर दिया है कि महापौर की कुर्सी कांग्रेस के पास होने के बावजूद निगम की राजनीति में मुकाबला खत्म नहीं हुआ है।
अब राजनीतिक हमला भी यहीं से तेज होगा। कांग्रेस की जीत के बाद जिस बहुमत को अनिल कल्ला की ताकत माना जा रहा था, उप महापौर चुनाव ने उसी बहुमत की एकजुटता पर सवाल खड़ा कर दिया है।
परिवारवाद के आरोपों की चर्चा फिर तेज
अनिल कल्ला के महापौर बनने के दौरान उनके परिवार और राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर विपक्ष की ओर से परिवारवाद के आरोप लगाए गए थे। अब उप महापौर चुनाव में कांग्रेस के भीतर सामने आए मतभेद उन आरोपों को राजनीतिक बहस का नया मुद्दा दे सकते हैं। हालांकि इसे सीधे तौर पर परिवारवाद का प्रमाण कहना राजनीतिक निष्कर्ष होगा; चुनाव परिणाम फिलहाल इतना जरूर बताते हैं कि कांग्रेस अपने बहुमत को उप महापौर चुनाव में एकजुट रखने में सफल नहीं रही।
और यही अनिल कल्ला के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है—महापौर की कुर्सी मिलने के 24 घंटे बाद ही क्या उनके सामने अपनी पार्टी और पार्षदों को साथ लेकर चलने की पहली चुनौती खड़ी हो गई है?
पंकज गहलोत की जीत ने इस सवाल को और धार दे दी है। महापौर कांग्रेस का और उप महापौर भाजपा का—अब बीकानेर नगर निगम में असली सियासी परीक्षा शुरू होगी।
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