कहानियां

यादगार चोट

 

लेखिका: अंजली पाण्डेय

पता नहीं क्यों, अब मुझे किसी के बदल जाने का उतना बुरा नहीं लगता। मानो मैंने अपने ज़ेहन में यह बैठा लिया हो कि बदलाव एक आम बात है।

अगर कोई बदल गया, तो इसमें हैरानी कैसी? आज की हवा जिस हिसाब से बह रही है, उसी हिसाब से लोगों का बदल जाना कोई बड़ी बात नहीं रह गई है।

पर इस बदलाव का नुकसान कई बार इतना बड़ा होता है कि कुछ लोग अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ यह समझने में बिता देते हैं कि — आख़िर मेरी गलती क्या थी कि वो इस तरह बदल गया?

लोग भरोसा करना भूल जाते हैं, उन्हें खुद से, अपनी मासूमियत से और लोगों से नफ़रत हो जाती है।

ऐसा ही कुछ मैरी के साथ हुआ।

जब वह सिर्फ 7 साल की थी, तभी उसकी माँ का निधन हो गया। वह बच्ची इस असहनीय पीड़ा को अपने मन में समेटे हुए अपने पिता के साथ रहने लगी।

उसके पिता हमेशा अपने कामों में व्यस्त रहते थे। उनका बदला हुआ व्यवहार मैरी को अंदर ही अंदर तोड़ रहा था।

कुछ समय बाद उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली। वह औरत मैरी को पसंद नहीं करती थी और मैरी भी उसे अपनी माँ का दर्जा नहीं देना चाहती थी।

उसने मैरी के पिता से कहकर उसे हॉस्टल छोड़ने का विचार बनवा लिया।

एक दिन मैरी के पिता उसे बिना कुछ बताए हॉस्टल ले गए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उसका सामान उसे थमाते हुए कहा,

“अब से तुम्हें यहीं रहना है।”

यह सुनते ही मैरी चीख-चीख कर रोने लगी।

वह अपने पिता के पैरों से लिपटकर ज़मीन पर बैठ गई और गिड़गिड़ाने लगी —

“मुझे यहाँ से ले चलिए पिताजी… मुझे यहाँ से ले चलिए…”

लेकिन उसके निष्ठुर पिता को ज़रा सा भी तरस नहीं आया।

वह कार में बैठकर जाने लगे। मैरी उनके पीछे दौड़ी… अचानक न जाने उसे क्या हुआ — वह रुक गई और बस अपने पिता को जाते हुए देखती रह गई।

हॉस्टल के सारे कर्मचारी यह देखकर चौंक गए कि मैरी को क्या हो गया है।

वह इस तरह स्थिर खड़ी थी, मानो समझदारी ने उसके पैर बाँध दिए हों और उसे यह समझ आ गया हो कि —

जब जाने वाला जाने का फ़ैसला कर ले, तो उसे रोकना पत्थर पर सिर मारने जैसा होता है।

उसने अपने कदम पीछे किए, अपना सामान उठाया और हॉस्टल के अंदर चली गई।

उस दिन मैरी ने हॉस्टल के बाहर ही अपनी मुस्कुराहट, अपनी चहक और अपनी मस्ती छोड़ दी।

कुछ दिनों तक वह बिल्कुल शून्य भाव से जीती रही।

फिर धीरे-धीरे उसने खुद को समझाने की कला सीख ली।

लेकिन उसके मन से अपने पिता के लिए नफ़रत कभी नहीं गई।

उसने अपने पिता का सरनेम छोड़कर अपने नाम के साथ अपनी माँ का नाम जोड़ लिया।

और तब से वह मैरी क्लारा बन गई।

आगे चलकर वह एक सुप्रसिद्ध मॉडल बनी।

वह अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उन एनजीओ को देती है, जो उसकी तरह छोड़े गए अनाथ बच्चों को सहारा देते हैं।

क्योंकि कुछ चोटें ज़िंदगी भर याद रहती हैं…

और कुछ दर्द इंसान को दूसरों का सहारा बनने की ताक़त दे देते हैं।

Viyasmani Tripaathi

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