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लोक-चेतना और अवधी माटी का महाकुंभ: श्रीराम औद्योगिक अनाथालय में गूंजी तुलसी-स्मृति और कजरी की स्वर-लहरियां

वरिष्ठ पत्रकार वैद्यराज संजय पांडेय स्टेट हेड उत्तर प्रदेश
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लोक-चेतना और अवधी माटी का महाकुंभ: श्रीराम औद्योगिक अनाथालय में गूंजी तुलसी-स्मृति और कजरी की स्वर-लहरियां
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले लखनऊ के अलीगंज स्थित ऐतिहासिक श्रीराम औद्योगिक अनाथालय का प्रांगण इन दिनों लोक-संस्कृति की सोंधी खुशबू और तुलसीमय भजनों से सराबोर था। अवसर था महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती का, जिसे भारतीय अवधी समाज ने एक विशिष्ट राष्ट्रीय, साहित्यिक और लोक-सांस्कृतिक अनुष्ठान के रूप में मनाया। यह आयोजन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि अवधी माटी की पारंपरिक थाती को अनाथालय के नौनिहालों के हृदय तक पहुँचाने का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और सांस्कृतिक उपक्रम साबित हुआ।
## अवधी लोकसाहित्य और कजरी का जीवंत वैभव
किसी भी समाज की पहचान उसकी लोकभाषा और लोकसंस्कृति से होती है। इस सांस्कृतिक संध्या का मुख्य आकर्षण रहीं प्रख्यात लोकगायिका डॉ कुसुम वर्मा, जिन्होंने अपनी सुमधुर और सधी हुई आवाज से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कार्यक्रम का शुभारंभ गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित मर्मभेदी लोकगीत “कहां के पथिक कहां कीन्हो है गमनवा” से किया। इस प्रस्तुति ने संपूर्ण वातावरण में एक आध्यात्मिक और साहित्यिक गरिमा का संचार कर दिया।
इसके उपरांत, सावन के महीने की उमंग और अवधी लोकसंस्कृति के अनूठे रंगों को समेटे हुए कजरी गीतों की ऐसी झड़ी लगी कि पूरा प्रांगण तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा:
* “अरे रामा रिमझिम से बरसे पनिया चली तो आवो जनिया रे हारी…”
* “कइसे खेलन जइबू सावन, हिंडोला कुंजबन डारो री झूलन आई राधिका प्यारी…”
* “रुचि-रुचि पीसे मेंहदिया…”
इन पारंपरिक धुनों और लोक-गीतों के माध्यम से अनाथालय के बच्चों ने न केवल सावन की फुहारों का आनंद लिया, बल्कि वे अपनी लोक-विरासत के बहुत करीब महसूस कर रहे थे। बाल-मन पर लोकगीतों का यह प्रभाव अद्भुत और प्रेरणादायी था।
## लोकभाषा के प्रणेता तुलसीदास और राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना
समारोह में वक्ताओं ने गोस्वामी तुलसीदास के ऐतिहासिक योगदान पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने रेखांकित किया कि किस प्रकार महाकवि ने कठिन शास्त्रीय भाषा के स्थान पर ‘लोकभाषा’ को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम चुना। लोकभाषा के जरिए उन्होंने भारतीय संस्कृति, भक्ति, मर्यादा और शाश्वत मानवीय मूल्यों को अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचाया।
तुलसी जयंती पर अवधी लोकगीत और कजरी जैसी लोक-विधाओं का आयोजन इस बात का प्रतीक है कि लोक-संस्कृति अकादमिक कक्षों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जन-जीवन की धड़कन है। यह आयोजन तुलसीदास जी के लोक-समर्पण और लोक-संस्कृति के प्रति उनकी अगाध निष्ठा को सच्ची श्रद्धांजलि था।
## मुख्य अतिथि की दृष्टि: संस्कृति ही राष्ट्र की सच्ची पहचान
कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाते हुए मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश पुलिस के सेवानिवृत्त उपमहानिरीक्षक (DIG) एवं वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी श्री ललन सिंह ने शिरकत की।
अपने प्रेरणादायी संबोधन में उन्होंने कहा: “लोकभाषा और लोकसंस्कृति किसी भी राष्ट्र की प्राणवायु होती हैं। आज के भौतिकवादी युग में जब नई पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर हो रही है, तब श्रीराम औद्योगिक अनाथालय जैसे संस्थानों में ऐसे आयोजनों का होना एक क्रांतिकारी कदम है। इन बच्चों के चेहरों पर लोकगीतों को सुनकर जो आनंद मैंने देखा, वह अमूल्य है। भारतीय अवधी समाज का यह प्रयास हमारी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने की दिशा में एक स्वर्णिम अध्याय है।”
## आत्मीयता, उल्लास और भविष्य का संकल्प
भारतीय अवधी समाज की ओर से आयोजित यह संपूर्ण कार्यक्रम अत्यंत आत्मीय, सहज और उल्लासपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। संस्था के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि लोकगीत, लोकसंगीत, अवधी भाषा और लोक-परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन का यह अभियान यहीं नहीं रुकेगा। आने वाले दिनों में भी इस तरह के सांस्कृतिक अनुष्ठान निरंतर आयोजित किए जाते रहेंगे ताकि नई पीढ़ी अपनी माटी की खुशबू से हमेशा जुड़ी रहे।
यह आयोजन इस सत्य का प्रमाण बन गया कि जब लोक-साहित्य और कला का मार्ग अनाथालय के इन नौनिहालों के जीवन से होकर गुजरता है, तो वह केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि एक संस्कारित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र की सुदृढ़ नींव रखता है।


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