कहानियां

परदा ही ठीक था

 

✍️ लेखिका: अंजली पांडेय

जैसा कि इस कहानी का शीर्षक है—“परदा ही ठीक था”, इसमें “परदा” शब्द का अर्थ घूंघट नहीं, बल्कि झूठ से है।

कई बार जीवन में हमें कुछ ऐसी सच्चाइयों का सामना करना पड़ता है, जिन्हें जानकर मन को गहरा आघात पहुंचता है। कई लोगों की उम्मीदें टूट जाती हैं, तो कुछ इतने हताश हो जाते हैं कि वे नए रिश्ते बनाने से भी डरने लगते हैं।

लोग कहते हैं कि झूठ नहीं बोलना चाहिए—मैं भी मानती हूं कि झूठ बोलना गलत है। लेकिन अगर सामने वाला व्यक्ति बहुत ज्यादा भावुक हो और मानसिक रूप से इतना मजबूत न हो कि वह सच्चाई को सह सके, तो शायद उसे हर सच बताना भी उचित नहीं होता।

कई बार जब हम अपने जीवन की पुरानी घटनाओं को याद करते हैं, तो वे उस समय समझ नहीं आतीं, लेकिन समय के साथ जब उनका अर्थ समझ में आता है, तो मन में घुटन बढ़ने लगती है।

क्या आपने कभी सोचा है कि बचपन में हम छोटी-छोटी बातों पर रोते थे—खिलौना न मिलने पर, पसंद का खाना न मिलने पर—लेकिन तब हम इतने दुखी नहीं रहते थे।

क्योंकि बचपन में रोना खुलकर होता था—चीख-चीख कर, दिल खोलकर। उस रोने में मन का सारा बोझ निकल जाता था, और थोड़ी ही देर में हम फिर से निश्चिंत हो जाते थे।

लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हमारा रोना भी बदल जाता है। अब आंसू खुलकर नहीं बहते, बल्कि सिसकियों में बदल जाते हैं।

कुछ लोग तो अपने मुंह को हाथ से दबाकर रोते हैं ताकि कोई उनकी आवाज न सुन सके। और जब कोई उनकी लाल आंखों का कारण पूछता है, तो वे बहाना बना देते हैं—“आंखों में कुछ चला गया था।”

धीरे-धीरे मुझे यह भी समझ आया कि अगर कोई व्यक्ति आपके साथ जीवन का सफर तय करने से इंकार कर दे, तो उसे दोष नहीं देना चाहिए।

जैसे हमें अपने पसंद के व्यक्ति के साथ सपने देखने का अधिकार है, वैसे ही उसे भी अपना रास्ता चुनने का अधिकार है।

बस फर्क इतना होता है कि उसने अपने सपने किसी और के साथ बुन लिए।

ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी सीख यही होती है कि अस्वीकृति को स्वीकार करना कैसे सीखें—बिना शोर किए, बिना शिकायत किए, खुद को कैसे समझाएं।

समय के साथ यह भी समझ आता है कि सच्चा आनंद किसी को बंधनों में बांधने में नहीं, बल्कि उसे आज़ादी देने में है।

किसी को कसमें देकर रोकने में नहीं, बल्कि यह देखने में है कि पूरी दुनिया के आकर्षण के बावजूद वह आपके साथ रहना चुने।

मजा तब नहीं आता जब हमें अपने रिश्ते को साबित करने के लिए सफाई देनी पड़े या कसमें खानी पड़ें।

मजा तो तब है, जब आपका साथी बिना कहे ही आप पर विश्वास करे और आपके पक्ष में खड़ा हो।

धीरे-धीरे यह समझ भी आने लगती है कि हर बार खुद को साबित करना जरूरी नहीं होता।

कई बार चुपचाप उन रिश्तों से अलग हो जाना ही बेहतर होता है, जो हमें समझ नहीं पाते।

कई बार हमें सच्चाई पता होती है, लेकिन हम चाहकर भी सामने वाले को यह नहीं बता पाते कि हम उसकी हर चाल समझ चुके हैं।

ऐसे में कई बार हमें लोगों के बीच अनजान या भोला बनकर रहना पड़ता है।

शायद यही समझदारी है।

इसी तरह की कई बातें इंसान को धीरे-धीरे खामोश बना देती हैं।

और तब इंसान के मन में एक ही ख्याल आता है—

“इस समझदारी से तो अच्छा था… झूठ का परदा ही ठीक था।”

Viyasmani Tripaathi

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