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फॉरएवर केमिकल्स: एक अदृश्य संकट डॉ. शोभित कुमार श्रीवास्तव

वेदान्त सिंह की रिपोर्ट
गोरखपुर (वेदांत टाइम्स)। आधुनिक जीवन में उपयोग होने वाली कई वस्तुएँ हमें सुविधा और आराम प्रदान करती हैं, लेकिन इन्हीं सुविधाओं के पीछे कुछ ऐसे रसायन छिपे हैं जो धीरे-धीरे मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर संकट बनते जा रहे हैं। इन्हें ही फॉरएवर केमिकल्स कहा जाता है, जिनका वैज्ञानिक नाम पीएफ़एएस (PFAS) है।
फॉरएवर केमिकल्स की सबसे चिंताजनक विशेषता यह है कि ये प्राकृतिक रूप से नष्ट नहीं होते। एक बार यदि ये मिट्टी, पानी या मानव शरीर में प्रवेश कर जाएँ, तो वर्षों तक वहीं बने रहते हैं। इसी कारण इन्हें “फॉरएवर” यानी हमेशा बने रहने वाले रसायन कहा जाता है।
आज ये रसायन हमारे दैनिक जीवन में कई रूपों में मौजूद हैं। नॉन-स्टिक बर्तनों, वाटरप्रूफ कपड़ों, फास्ट-फूड पैकेजिंग, फायर-फाइटिंग फोम, सौंदर्य प्रसाधनों और कुछ औद्योगिक उत्पादों में इनका व्यापक उपयोग हो रहा है। बाहरी रूप से आकर्षक और टिकाऊ दिखाई देने वाले ये उत्पाद लंबे समय में गंभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, फॉरएवर केमिकल्स मानव शरीर में धीरे-धीरे जमा होते रहते हैं। इनके प्रभाव से हार्मोन असंतुलन, प्रतिरक्षा प्रणाली की कमजोरी, कैंसर का खतरा, तथा बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। चिंता की बात यह भी है कि ये रसायन पीने के पानी और भोजन के माध्यम से शरीर में पहुँच सकते हैं।
पर्यावरण पर भी इनका प्रभाव अत्यंत गंभीर है। नदियों, झीलों और भूजल में पहुँचकर ये जलचर जीवों को प्रभावित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप पूरी खाद्य श्रृंखला दूषित हो जाती है, जिसका असर अंततः मानव जीवन पर पड़ता है। मिट्टी में इनकी मौजूदगी कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिए भी चुनौती बन रही है।
इस समस्या का समाधान केवल सरकारों या वैज्ञानिक संस्थानों तक सीमित नहीं है। आम नागरिकों की जागरूकता और जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है। सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को अपनाना, उत्पादों के बारे में जानकारी लेना और अनावश्यक रासायनिक उपयोग से बचना आज की आवश्यकता है। साथ ही, सख़्त पर्यावरणीय नीतियाँ और उनका प्रभावी पालन भी अनिवार्य है।
फॉरएवर केमिकल्स एक मूक लेकिन गहरा संकट हैं। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और भविष्य का प्रश्न है।
अब समय है जागरूक होने का, सोचने का और जिम्मेदारी निभाने का।

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