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कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला: सामाजिक न्याय की नींव, सबसे पिछड़ों तक हक़ पहुँचाने का मॉडल

राजस्थान हेड डॉ राम दयाल भाटी
जननायक कर्पूरी ठाकुर द्वारा वर्ष 1978 में बिहार में लागू किया गया “कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला” आज भी सामाजिक न्याय की बहस में बेहद प्रासंगिक माना जाता है। यह फॉर्मूला मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों पर आधारित एक ग्रेडेड (स्तरीय) आरक्षण व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि आरक्षण का लाभ सिर्फ प्रभावशाली जातियों तक सीमित न रह जाए, बल्कि समाज के सबसे पिछड़े और वंचित तबकों तक पहुँचे।
क्या है कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला?
इस फॉर्मूले के तहत कुल 26% आरक्षण को अलग-अलग सामाजिक वर्गों में इस प्रकार विभाजित किया गया था—
अति पिछड़ा वर्ग (EBC): लगभग 12%
पिछड़ा वर्ग (BC): लगभग 8–12%
महिलाओं के लिए (सभी वर्गों में): 3%
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS – गरीब अगड़े): 3%
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि OBC के भीतर भी उप-वर्गीकरण किया गया, ताकि यादव, कुर्मी जैसी अपेक्षाकृत मजबूत जातियां पूरा लाभ न ले सकें और नाई, मल्लाह, धुनिया, कहार जैसी अत्यंत पिछड़ी जातियों को प्राथमिकता मिल सके।
सबसे पिछड़ों को मिला असली हक
कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला ने उस “बाघ और बकरी” वाली स्थिति को तोड़ने की कोशिश की, जहाँ आरक्षण का फायदा हमेशा ताकतवर वर्गों को मिलता रहा है।
इससे अति पिछड़े वर्गों की शिक्षा, रोजगार और प्रशासनिक हिस्सेदारी में बढ़ोतरी का रास्ता खुला।
महिला सशक्तिकरण की मजबूत नींव
फॉर्मूले में महिलाओं के लिए अलग आरक्षण का प्रावधान कर लैंगिक समानता को भी मजबूती दी गई। आगे चलकर बिहार जैसे राज्यों में इसी सोच के तहत महिलाओं को 35% तक आरक्षण दिया गया, जिससे सरकारी नौकरियों में महिला भागीदारी ऐतिहासिक रूप से बढ़ी।
गरीब अगड़ों को भी मिला स्थान
इस मॉडल में आर्थिक रूप से कमजोर ऊपरी जातियों को भी शामिल किया गया, जिससे यह व्यवस्था संतुलित और समावेशी बनी। इससे सामाजिक तनाव कम हुआ और आरक्षण को लेकर व्यापक स्वीकृति बनी।
नीतीश कुमार सरकार और कर्पूरी मॉडल
बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कर्पूरी ठाकुर के इसी विजन को आगे बढ़ाते हुए आरक्षण की सीमा 75% तक बढ़ाई, जिसमें EBC को सबसे अधिक लाभ दिया गया। यह कदम सामाजिक न्याय की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना गया।
देशभर में लागू हो तो क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाए, तो—
OBC/EBC के भीतर की असमानता कम होगी
सबसे गरीब और पिछड़े तबकों को वास्तविक प्रतिनिधित्व मिलेगा
शिक्षा और रोजगार में समान अवसर बढ़ेंगे
सामाजिक सद्भाव और इक्विटी मजबूत होगी
सिर्फ आरक्षण नहीं, एक विचारधारा
कर्पूरी ठाकुर का यह फॉर्मूला महज़ आरक्षण की नीति नहीं, बल्कि “सबसे नीचे खड़े व्यक्ति तक न्याय पहुँचाने” की सोच है। आज जब देश में सामाजिक न्याय की नई परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं, तब कर्पूरी ठाकुर का यह मॉडल पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।

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