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अष्टांग योग में ‘शौच’ का महत्व: आंतरिक व बाह्य पवित्रता से मोक्ष पथ की ओर अग्रसर होता मानव – डॉ नवीन सिंह

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती। अष्टांग योग के दूसरे अंग ‘नियम’ के अंतर्गत आने वाले पाँच विभागों में पहला विभाग शौच है। शौच का मूल अर्थ है पवित्रता और स्वच्छता, जो योग साधना की आधारशिला मानी जाती है। योग दर्शन के अनुसार शौच केवल बाहरी स्वच्छता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आंतरिक और बाह्य—दोनों प्रकार की शुचिता का समावेश है।
योगाचार्य डॉ. नवीन सिंह (पतंजलि योग पीठ हरिद्वार, यूनिट बस्ती) ने बताया कि वाह्य शुचिता का अर्थ है शरीर, वस्त्र और अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखना। इसमें साबुन, सर्फ, जल, झाड़ू आदि भौतिक साधनों के माध्यम से बाहरी सफाई शामिल है। बाहरी स्वच्छता न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है, बल्कि मानसिक प्रसन्नता का भी कारण बनती है।
वहीं आंतरिक शुचिता का संबंध मन और आचरण से है। उत्तम व्यवहार, सदाचार, सत्यभाषण और सकारात्मक चिंतन द्वारा मन को पवित्र रखना ही आंतरिक शौच कहलाता है। इस संदर्भ में शास्त्रों में कहा गया है—
“मनः सत्येन शुद्ध्यति”,
अर्थात सत्य भाषण और सत्य आचरण से ही मन शुद्ध होता है।
डॉ. सिंह ने कहा कि शौच के नियमित अनुष्ठान से साधक का व्यक्तित्व निखरता है, वह समाज में प्रिय बनता है और धीरे-धीरे मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होता है। शौच न केवल योग साधना को दृढ़ बनाता है, बल्कि जीवन को भी संतुलित और सार्थक बनाता है।
उन्होंने बताया कि नियम के अगले विभाग ‘संतोष’ पर कल विस्तार से चर्चा की जाएगी। इसके लिए योग और जीवन मूल्यों में रुचि रखने वाले साधकों से जुड़े रहने का आग्रह किया गया है।
— डॉ. नवीन सिंह
योगाचार्य
पतंजलि योग पीठ हरिद्वार, यूनिट बस्ती

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