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मनुमुक्त ट्रस्ट नारनौल द्वारा अंतरराष्ट्रीय नागरी लिपि सम्मेलन आयोजित

ब्यूरो चीफ सतीश कुमार महेंद्रगढ़ हरियाणा
*नारनौल टुडे न्यूज़*
*मनुमुक्त ट्रस्ट नारनौल द्वारा अंतरराष्ट्रीय नागरी लिपि सम्मेलन आयोजित*
*सात देशों के विद्वानों ने किया नागरी लिपि की स्थिति पर विचार-मंथन*
मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा स्थानीय सैक्टर-1, पार्ट-2 स्थित मनुमुक्त भवन में ‘अंतरराष्ट्रीय नागरी लिपि सम्मेलन’ का भव्य आयोजन आज किया गया, जिसमें भारत, नेपाल, थाईलैंड, आस्ट्रेलिया, नीदरलैंड, कोस्टा रीका और कनाडा सहित सात देशों के लगभग दो दर्जन विद्वानों ने सहभागिता की। डॉ. सुनील भारद्वाज द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना-गीत के उपरांत महाकाली साहित्य-संगम, महेंद्रनगर (नेपाल) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हरीशप्रसाद जोशी की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय हिंदी संगठन, आसन (नीदरलैंड) की अध्यक्ष डॉ. ऋतु शर्मा मुख्य अतिथि के रूप मे उपस्थित रहीं।
*नागरी लिपि को विश्व की सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि बताते हुए डॉ. ऋतु शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि नागरी लिपि कंप्यूटर युग के भी सर्वथा अनुरूप है। वैज्ञानिकता के कारण विश्व-भर में इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है।अध्यक्षीय वक्तव्य में हरीशप्रसाद जोशी ने स्पष्ट किया कि नागरी मात्र हिंदी की लिपि न होकर नेपाल की अधिकतर बोलियों और भाषाओं की भी लिपि है। अतः हिंदी और नेपाली भाषाएं विश्व में जहां कहीं भी जाती हैं, उनकी लिपि नागरी भी वहां पहुंच जाती है।*
हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़ में हिंदी-विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ. बीरपालसिंह यादव और राजकीय महिला महाविद्यालय, अलवर (राजस्थान) के प्राचार्य डॉ. अनूप सिंह ने भी, विशिष्ट अतिथि वक्ता के रूप में, नागरी लिपि के स्वरूप और स्थिति पर विस्तृत चर्चा करते हुए, इसके महत्त्व और प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि लिपि-विहीन बोलियों के लिए नागरी सर्वाधिक उपयुक्त लिपि हो सकती है तथा इसमें विश्व लिपि बनने की भी पूरी क्षमता है। इससे पूर्व विषय-प्रवर्तन करते हुए, चीफ ट्रस्टी तथा सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) में हिंदी-विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ. रामनिवास ‘मानव’ ने कहा कि नागरी लिपि को संपर्क लिपि के रूप में स्वीकार कर लिया जाये, तो यह राष्ट्रीय एकता में बड़ी सहायक सिद्ध हो सकती है। उन्होंने नागरी लिपि पर केंद्रित दोहा-पाठ भी किया।
*इस अवसर पर ट्रस्ट द्वारा नेपाल के हरीश प्रसाद जोशी (महेंद्रनगर) और प्रो. मोहनप्रसाद चौधरी (कंचनपुर), नीदरलैंड की डॉ. ऋतु शर्मा (आसन), थाईलैंड के धनभद्र लपसिरिकुल (बैंकाॅक), आस्ट्रेलिया के बाबूलाल शर्मा (पर्थ), कोस्टा रीका के हवीयर कोर्दैरो (सैन जोसे), कनाडा के हरमहेंद्र सिंह (टोरंटो) और भारत के चवाकुल रामकृष्ण राव, हैदराबाद (तेलंगाना), डॉ. कृष्णा मणिश्री, मैसूर (कर्नाटक), डॉ. प्रिया ए, कोट्टायम (केरल), डॉ. प्रभु चौधरी, उज्जैन (मध्यप्रदेश), रजनी प्रभा, मुजफ्फरपुर (बिहार), डॉ. उज्ज्वला राठौड़, धामी और डॉ. दिनेशकुमार शर्मा, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश), डॉ. अनूप सिंह, बहादुरपुर और डॉ. भीमसिंह सुथार, भादरा (राजस्थान), डॉ. सतीशकुमार यादव, पूसा (दिल्ली) तथा हरियाणा से पानीपत की डॉ. आभा त्यागी, रोहतक की डॉ. राजल गुप्ता, फरीदाबाद की डॉ. मधु सिंगला, भिवानी की डाॅ. सुशीला आर्य, रेवाड़ी की डाॅ. परवीन कुमारी और प्रो. मुकुट अग्रवाल, फतेहाबाद की डॉ. कृष्णा कंबोज, अटेली के डॉ. छतरसिंह वर्मा तथा नारनौल की डॉ. मीना यादव, डॉ. शर्मिला यादव और डॉ. पंकज गौड़ को, हिंदी भाषा, साहित्य और नागरी लिपि के विकास में उनके उल्लेखनीय योगदान के दृष्टिगत, विभिन्न नामित सम्मानों से नवाजा गया।*
लगभग अढ़ाई घंटों तक चले इस महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक सम्मेलन में ट्रस्टी डॉ. कांता भारती, नर्मदा शर्मा, पर्थ (आस्ट्रेलिया), पूजा शर्मा (दिल्ली), हरीश चौहान (शिमला), प्रमोद ठाकुर (कांगड़ा), मानसिंह कानोड़िया (झुंझुनूं), डॉ. यशदेव त्यागी (पानीपत), बलजीत सिंह (नारनौंद), डॉ. रविप्रताप पांडेय (महेंद्रगढ़), डॉ. धर्मवीर यादव (मीरपुर), प्रो. बलबीरसिंह सुथार (रेवाड़ी), विपिन शर्मा, दुलीचंद शर्मा, महेंद्रसिंह गौड़, डॉ. महीपाल सिंह, डॉ. सुमेरसिंह यादव, दुलीचंद शर्मा, सुरेशचंद शर्मा, डॉ. वंदना कुमारी, श्रद्धा शर्मा, कृष्णकुमार शर्मा, एडवोकेट, सत्यवीर चौधरी, अशोक सैनी आदि गणमान्य नागरिकों की उपस्थित विशेष उल्लेखनीय रही।

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