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विभिन्न संगठनों ने भारत की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फूले की धूमधाम से मनाई जयंती
सावित्रीबाई फुले ने सती प्रथा, बाल-विवाह, छुआछूत जैसी अनेक कुरुतियों के निवारण में निभाई अहम भूमिका

संवाददाता बिरदी चंद गोठवाल
नारनौल, 03 जनवरी
भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका एवं मराठी कवयित्री सावित्रीबाई फुले की जयंती के अवसर पर सर्व अनुसूचित जाति संघर्ष समिति के तत्वावधान में बैठक का आयोजन बुधवार को समिति के प्रधान एवं पूर्व चीफ मैनेजर चन्दन सिंह जालवान की अध्यक्षता में गुरु रविदास मंदिर में किया गया । बैठक का संचालन सर्व समाज के प्रदेश महासचिव एवं कबीर सामाजिक उत्थान संस्था, दिल्ली के प्रमुख सलाहकार बिरदी चंद गोठवाल द्वारा किया गया । बैठक में सर्वप्रथम गुरु रविदास महासभा के संरक्षक बाबा बालकदास, संघर्ष समिति के प्रधान चन्दन सिंह जालवान व प्रमुख सलाहकार व पूर्व तहसीलदार लालाराम नाहर व महासचिव बिरदी चंद गोठवाल, प्रधान अनिल फाण्डन आदि द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर सावित्रीबाई फुले के चित्र पर माल्यार्पण किया । तत्पश्चात उपस्थित सभी सदस्यों द्वारा सावित्रीबाई फुले के चित्र पर पुष्प अर्पित किए गए ।
बैठक में सर्व समाज के महासचिव बिरदी चंद गोठवाल द्वारा सावित्रीबाई फुले के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सावित्रीबाई फुले का जन्म 03 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र राज्य के सतारा जिले के नायगांव के वंचित समाज में हुआ । सावित्रीबाई फुले एक प्रमुख सामाजिक सुधारक, शिक्षाविद और कवयित्री थी, जिन्होंने 19वीं शताब्दी के दौरान महिला शिक्षा और सशक्तिकरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । सावित्रीबाई फुले ने 1852 में बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की । छूआछूत के उस दौर में इन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन वे अपने मिशन से पीछे नहीं हटी और महिलाओं व समस्त वंचित समाज के लिए शिक्षा की ज्योति जलाई । उन्हें उस समय की साक्षर महिलाओं में गिना जाता है ।
समिति के प्रमुख सलाहकार लालाराम नाहर, प्रधान चन्दन सिंह जालवान, हरियाणा चमार महासभा के जिलाध्यक्ष अनिल फाण्डन, सरस्वती ग्रामीण एवं शिक्षा विकास केंद्र के प्रधान अनिल सैनी, सहसचिव सुमेर गोठवाल व धर्मवीर कटारिया आदि ने अपने संयुक्त ब्यान में बताया कि सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक कुरीतियों का निवारण करने के लिए बाल विवाह के प्रति समाज को शिक्षित और उन्मूलन करने, सती प्रथा के खिलाफ प्रचार करने व विधवा पुनर्विवाह के लिए पूरजोर वकालत की । महाराष्ट्र के सामाजिक सुधार आंदोलन का एक प्रमुख व्यक्तित्व उन्हें डॉ भीमराव अंबेडकर, अन्नाभाऊ साठे की पसंद के साथ दलित मंगल जाति का प्रतीक माना जाता है । सावित्रीबाई फुले ने जातिगत भेदभाव और लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने में सक्रिय रूप से भूमिका निभाई और 1897 में प्लेग से पीड़ित रोगियों की सेवा करते करते 10 मार्च 1897 को वह इस नश्वर संसार को छोड़ गई ।
इस अवसर पर संघर्ष समिति के प्रमुख सलाहकार शिवनारायण मोरवाल, गुरु रविदास महासभा के प्रधान बलबीर सिंह बबेरवाल, महर्षि वाल्मीकि महासभा के राजेश चांवरिया, खटीक सभा के खण्ड प्रधान पत राम खिंची, कोली सभा के प्रधान तोताराम, पूर्व चीफ मैनेजर ओमप्रकाश चौहान, पूर्व वरिष्ठ प्रबंधक जयपाल सिंह, पूर्व लेखाधिकारी रामकुमार ढ़ैणवाल, हजारीलाल खटावला, हरिराम सिरोहा, रामचंद्र गोठवाल, करतार सिंह, सचिव रमेश चंद, सुरेश कुमार नारनोलिया, प्रीतम सिंह, रामचंद्र सैनी, बनवारी लाल, प्रेम चंद सैनी, पंजाब रत्न, विक्रम माण्डैया, मोहन सिंह आदि अनेक लोग उपस्थित रहे ।
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