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वैदिक हिन्दू नववर्ष का इतिहास: प्राचीन परंपरा और नवसृजन का प्रतीक – डॉ. अर्चना दुबे

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती (वेदांत टाइम्स/बस्ती टाइम्स 24)। अखंड एक्यूप्रेशर रिसर्च ट्रेनिंग एंड ट्रीटमेंट इंस्टीट्यूट प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ. अर्चना दुबे ने वैदिक हिन्दू नववर्ष के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह परंपरा अत्यंत प्राचीन और वैदिक काल से जुड़ी हुई है। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नववर्ष का शुभारंभ होता है, जिसे नव संवत्सर के रूप में मनाया जाता है।
डॉ. दुबे ने बताया कि वैदिक काल में नववर्ष की गणना प्रकृति और ऋतुओं के आधार पर की जाती थी। वसंत ऋतु को नवजीवन और नवसृजन का काल माना गया है, जब प्रकृति अपने नए स्वरूप में प्रकट होती है। पेड़ों पर नई पत्तियां, फूलों का खिलना और वातावरण में ताजगी इस बात का संकेत देते हैं कि यह समय नई शुरुआत का है।
उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी, इसलिए इस तिथि को सृष्टि के आरंभ का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है और लोग इस अवसर पर नए कार्यों की शुरुआत करते हैं।
डॉ. अर्चना दुबे ने बताया कि प्राचीन समय से ही इस दिन विशेष पूजा-पाठ, हवन और धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा रही है। लोग अपने घरों की साफ-सफाई कर उन्हें सजाते हैं, नए वस्त्र धारण करते हैं और परिवार के साथ मिलकर ईश्वर की आराधना करते हैं। यह दिन न केवल आध्यात्मिक उन्नति का अवसर प्रदान करता है, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और नई दिशा भी देता है।
उन्होंने कहा कि वैदिक हिन्दू नववर्ष का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व समाज में एकता, भाईचारा और सामूहिक उत्सव की भावना को बढ़ावा देता है। लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देकर आपसी संबंधों को मजबूत बनाते हैं।
अंत में डॉ. अर्चना दुबे ने सभी जनपदवासियों को वैदिक हिन्दू नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह नववर्ष सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मकता लेकर आए तथा सभी के जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करे।

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