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महान गांधीवादी नेता गुलजारीलाल नन्दा की जयंती/पुण्यतिथि पर विशेष

राजस्थान हेड डॉ राम दयाल भाटी
भारत के पूर्व कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नन्दा का नाम देश के सादगीपूर्ण और ईमानदार नेताओं में सम्मान के साथ लिया जाता है। 4 जुलाई 1898 को सियालकोट (अब पाकिस्तान) में जन्मे नंदा जी ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र सेवा और श्रमिकों के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया।
📌 दो बार बने कार्यवाहक प्रधानमंत्री
नंदा जी पहली बार 1964 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद और दूसरी बार 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने। दोनों ही बार उन्होंने तब तक यह जिम्मेदारी संभाली, जब तक कांग्रेस पार्टी ने नया नेता नहीं चुन लिया।
📚 शिक्षा और प्रारंभिक जीवन
नंदा जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सियालकोट में प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। उन्होंने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर और कानून में स्नातक की डिग्री हासिल की।
🇮🇳 स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
नंदा जी 1921 के असहयोग आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे और जेल भी गए। वे अहमदाबाद की टेक्सटाइल इंडस्ट्री में लेबर एसोसिएशन के सचिव रहे और मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे।
🏛️ राजनीति और योगदान
नंदा जी मुंबई विधानसभा के सदस्य रहे और बाद में केंद्र सरकार में योजना, सिंचाई, ऊर्जा और श्रम जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। वे कई बार योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे और देश की पंचवर्षीय योजनाओं में अहम भूमिका निभाई।
🏅 सम्मान और पुरस्कार
देश के प्रति उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 1997 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
🕊️ सादगीपूर्ण जीवन और निधन
सादगी और ईमानदारी के प्रतीक नंदा जी का 15 जनवरी 1998 को 100 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उन्हें एक सच्चे गांधीवादी नेता के रूप में हमेशा याद किया जाता रहेगा।
👉 निष्कर्ष:
गुलजारीलाल नन्दा का जीवन आज के नेताओं और युवाओं के लिए प्रेरणा है। उनकी सादगी, ईमानदारी और राष्ट्रभक्ति की मिसाल आने वाली पीढ़ियों को मार्गदर्शन देती रहेगी।

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