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नाभि में तेल डालना: ट्रेंड नहीं, आयुर्वेदिक परंपरा – प्रो.डॉ नवीन सिंह

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती। (विशेष संवाददाता) — सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रिय हो रहे “नाभि में तेल डालने” के उपाय को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों और आयुर्वेदाचार्यों ने स्पष्ट किया है कि यह कोई नया ट्रेंड नहीं, बल्कि प्राचीन आयुर्वेदिक पद्धति है जिसे शास्त्रों में “नाभि पूरण” कहा गया है। आयुर्वेद के अनुसार नाभि शरीर की ऊर्जा का केंद्रीय बिंदु है, जहाँ समान और अपान वायु का संतुलन प्रभावित होता है। यही कारण है कि नाभि को वात का मुख्य केंद्र माना गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब शरीर में वात बढ़ जाता है तो कब्ज, गैस, पेट में खिंचाव, रूखी त्वचा, होंठ फटना और पाचन कमजोरी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। ऐसे मामलों में नाभि में हल्का तेल या घी डालना लाभकारी हो सकता है। इसके साथ ही एसिडिटी, पेशाब में जलन, गुदा में जलन या फिशर जैसे पित्त विकारों में भी ठंडे स्वभाव के तेल या घी से राहत मिलने की बात कही गई है। महिलाओं में मासिक धर्म के दौरान दर्द और पेल्विक असहजता में भी यह सहायक हो सकता है।
विश्व संवाद परिषद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय महासचिव प्रोफेसर डॉ नवीन सिंह ने बताया कि यह उपाय सभी के लिए उपयुक्त नहीं है। जिन लोगों में अत्यधिक कफ, बहुत चिकना मल, बार-बार पेशाब या गंभीर मोटापा हो, उन्हें नाभि में घी या भारी तेल डालने से बचने की सलाह दी गई है। ऐसे लोगों के लिए सीमित अवधि तक हल्का गरम सरसों का तेल उपयोगी बताया गया है, लेकिन जलन महसूस होने पर तुरंत बंद कर देना चाहिए।
तेल चयन को लेकर विशेषज्ञों ने मार्गदर्शन दिया है—सामान्य व्यक्ति नारियल तेल, अधिक वात वाले तिल का तेल और अधिक गर्मी वाले घी या नारियल तेल का उपयोग करें। लगाने का सबसे उपयुक्त समय सुबह खाली पेट या रात सोने से पहले माना गया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि नाभि में तेल डालना कोई चमत्कारिक इलाज नहीं, लेकिन सही व्यक्ति, सही तेल और सही स्थिति में यह एक उपयोगी आयुर्वेदिक उपाय हो सकता है।

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