कहानियां
अब यादें ही हैं

लेखिका: अंजली पाण्डेय
ज़िंदगी की दौड़ में कब बचपन बीत गया, पता ही नहीं चला।
बरसों बाद आज फिर मेरी ज़िंदगी की किताब खुली है।
इस किताब के पन्नों में मुझे मेरा सुनहरा बचपन, बेफ़िक्री भरा बचपन और चंचलता से भरा बचपन फिर से मिल गया।
इन पन्नों में मेरी चोरियां हैं, मेरी शरारतें हैं, मेरी लड़ाइयाँ हैं।
कभी किसी के बगीचे से कच्चे आम, आँवला, इमली चुराना, तो कभी किसी के खेत से मटर और चना—ये सब यादें आज भी उतनी ही अनोखी और यादगार लगती हैं।
शरारतों के चक्कर में कई बार चोट भी लग जाती थी, लेकिन तब उन चोटों के दर्द का ज़्यादा असर नहीं होता था।
उस समय कोई रोक-टोक नहीं होती थी—किसी भी दोस्त के घर चले जाओ, जितनी देर चाहो खेलो।
पहले की लड़ाइयों में भी एक अलग ही मज़ा हुआ करता था।
लड़ाई का सही मतलब तो पता नहीं होता था, लेकिन ऐसे लड़ते थे जैसे जन्मों के कट्टर दुश्मन हों।
किसी कार्यक्रम में जब किसी के घर बुलाया जाता था, तो दोस्तों के साथ बैठकर घंटों बातें करना हमारी सबसे पसंदीदा आदत थी।
कभी दोस्तों को खास नामों से चिढ़ाना, तो कभी डरावनी कहानियाँ सुनाकर डराना—ये सब बचपन की खास शरारतें थीं।
जब स्कूल जाने का मन नहीं होता था, तो मम्मी को मनाना भी एक खास कला थी, जो हम सबमें थी।
दोपहर में जब मम्मी सो जाती थीं, तब उनकी साड़ी पहनकर खेलना—उसमें एक अलग ही मज़ा आता था।
एक बार साड़ी पहनकर खेलने के दौरान मैं सीढ़ियों से गिर गई थी और सिर में चोट लग गई थी।
ऐसी न जाने कितनी ही बातें बचपन में हुईं।
जब मैं छोटी थी, तो अनार को “अनरा” और चम्मच को “नममच” कहा करती थी।
बचपन में ख़तरों से उतना डर नहीं लगता था।
पैसों की भी ज़्यादा समझ नहीं होती थी—जो मिलता, तुरंत खर्च कर देते थे।
जब हम छोटे थे, तो लगता था कि मम्मी-पापा हमारी शरारतें नहीं समझते होंगे।
लेकिन आज जब बड़े हुए, तो समझ आया कि वे सब कुछ जानते थे—बस जानबूझकर अनजान बने रहते थे।
बचपन में हम सबको एक खास वहम होता है कि बड़े होकर ज़िंदगी बहुत अच्छी हो जाएगी।
जबकि सच तो यह है कि ज़िंदगी का सबसे खास और खूबसूरत दौर तो वही बचपन था।
न कमाने की चिंता थी, न खर्च का हिसाब—बस खाना, पीना और मौज-मस्ती।
उम्मीद है कि मेरी इन बातों को पढ़कर आपको भी अपने बचपन की कोई मीठी याद ज़रूर आई होगी।
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