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अच्छी सेहत के लिए अनिवार्य हैं अच्छी आदतें – डॉ अर्चना दुबे

बस्ती से वेदान्त सिंह

 

 

‘ आचार्य चाणक्य ने कहा है – सबका करके सर्वप्रथम शरीर (सेहत) का रक्षण करना चाहिए, क्योंकि शरीर के नष्ट होने पर सबका नाश हो जाता है। आचार्य चाणक्य की यह उक्ति सैकड़ों वर्ष पूर्व भी सत्य थी और आज भी उतनी ही महासत्य है। वस्तुतः सेहत ही नेमत है। सांसारिक सुखों का पूर्ण आनंद सेहतमंद व्यक्ति ही प्राप्त कर सकता है। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि शरीर ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन है। समस्त सुखों में आरोग्य को ही पहला सुख माना गया है। ‘पहला सुख निरोगी काया’ कहकर चिकित्साशास्त्रियों ने इसी सत्य का समर्थन किया है। आरोग्य के समान कोई बहुमूल्य वस्तु नहीं है। अतः इसके लिए सदैव प्रयत्नशील रहना प्रत्येक व्यक्ति का परम कर्तव्य है।

आजीवन स्वस्थ रहने के लिए उन प्राकृतिक नियमों का पालन करना अनिवार्य है, जिससे शरीर रोगों से मुक्त रहे और चित्त सतत संतुष्ट व प्रसन्न रहे। अनेकानेक ऐसे कारण हैं, जो सेहत पर लगातार प्रहार करके रुग्णता की ओर ले जाते हैं। हमारा स्वास्थ्य हमारे ही हाथों में है और पूरी तरह हमारी आदतों पर अवलंबित है। आदतें स्वस्थ हैं, तो कुंडली पर जाने की कोई जरूरत नहीं। इसके विपरीत आदतें खराब हैं, तो सेहतमंद रहना सपना है। आदतें सुधरीं, तो सेहत सुधर गयी।

स्वस्थ और सुखमय जीवन के लिए मुख्यतः निम्नलिखित आदतें महत्वपूर्ण हैं-

 *पर्याप्त मात्रा में पानी पिए*

सुबह उठकर इच्छानुसार जल का सेवन करने से गैस्ट्रिक व कब्ज की शिकायत नहीं होती, पाचन संस्थान को पर्याप्त बल मिलता है, सरलतापूर्वक मल विसर्जन होता है, जिससे आंतों व पेट की सफाई हो जाती है, खुलकर भूख लगती है तथा पूरे दिन शरीर में जल तत्व की कमी नहीं हो पाती। नियमित उषापान से शरीर में इलेक्ट्रोलायटिक संतुलन बना रहता है तथा मन-मस्तिष्क सहज, शांत सक्रिय तथा संतुलित बना रहता है।

*प्रतिदिन व्यायाम तथा योगासन-प्राणायाम करें*

सुबह में जल्दी उठकर दैनिक नित्यक्रिया से निवृत्त होकर नियमित रूप से शारीरिक बलाबल के अनुसार शारीरिक सक्रियता हेतु व्यायाम करें। योग को अपनी दिनचर्या में अवश्य शामिल कर लें। इससे शरीर के अंग-प्रत्यंग परिपुष्ट, सबल, लोचदार व स्वस्थ होते हैं, मांसपेशियां मजबूत होती हैं, शरीर में वसा का अनुपात समन्वित रहता है, मोटापे की समस्या दूर रहती है, रग-रग में पर्याप्त रक्त संचार होने से ब्लडप्रेशर, मधुमेह व न्यूरोसिस की समस्या का प्राकृतिक रूप से बिना किसी औषधि के ही निराकरण होने लगता है तथा शारीरिक दुर्बलता व मानसिक रोग दूर होते हैं। योग से स्वभाव में सहजता, स्थिरता, प्रसन्नता का समावेश होता है, पुरुषों में पौरुष-बल की वृद्धि होती है तथा अधिक उम्र के पुरुषों में इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या स्वतः दूर होने लगती है। नियमित व्यायाम से पुरुषों में इरेक्शन 30 प्रतिशत तक बढ़ता पाया गया है, जबकि इससे स्त्रियों के यौनांगों में भरपूर रक्त संचार होने से उनमें फ्रिजिडिटी की समस्या का स्वतः निवारण हो जाता है।

*सुबह में पौष्टिक नाश्ता अवश्य लें*

सुबह के पौष्टिक नाश्ते में सेहत का राज छिपा होता है। अतः इसे नजरअंदाज करना सबसे खराब आदत है। रात्रि विश्राम की लंबी अवधि के बाद शरीर में ग्लूकोज का स्तर कम हो जाता है। सुबह का पौष्टिक नाश्ता इस स्तर को कायम रखता है, जिससे दिनभर न सिर्फ कार्यों के लिए भरपूर शक्ति उपलब्ध होती है, बल्कि शरीर में चुस्ती-स्फूर्ति, शक्ति व ताजगी के साथ मानसिक खुशी और भावनात्मक स्थिरता बनी रहती है। विटामिंस, मिनरल्स, प्रोटीन, फाइबर और कम वसायुक्त सुबह का नाश्ता लेना अच्छी सेहत के लिए सबसे अच्छी आदत है।

*प्रतिदिन सुबह-शाम टहलें*

पहले 15 मिनट तक वर्कआउट करने से शर्करा और कार्बो. बर्न होता है, जबकि 30 मिनट के वर्कआउट से फैट बर्न होता है। 30 मिनट की तेज गति की चहलकदमी से 300 कैलोरी बर्न होती है। प्रतिदिन आधे घंटे का भ्रमण एक स्वस्थ आदत है। अधिक पैदल चलने वाले लोग अधिक प्रसन्न रहते हैं। प्रतिदिन 30 मिनट तक टहलने से जीवन के कई वर्ष बढ़ जाते हैं।

चाहे तेजी से या रुक-रुककर हर तरह से टहलना लाभदायी है। पैदल चलने वाले प्रसन्न, सक्रिय और संतुष्ट रहते हैं। पैदल चलने से तनाव, डिप्रेशन दूर होता है। इसलिए बहाने न ढूंढ़ें और प्रतिदिन कम-से-कम 10 हजार कदम पैदल टहलने की आदत डालें। भ्रमण और एक्सरसाइज के लिए खुद को प्रेरित करें। जब हमारे पास खाने-सोने-बातचीत करने का समय निकल जाता है, तो एक्सरसाइज, भ्रमण के लिए समय कैसे नहीं मिल सकता, जबकि इससे हम उत्साह, ऊर्जा, शक्ति से लबालब हो जाते हैं। अतः प्रतिदिन भ्रमण और एक्सरसाइज करें।

खान-पान में संयम और अनुशासन बरतें।

अपने दैनिक खान-पान के प्रति

सजग, सतर्क, सावधान रहें। अपनी स्वाद लोलुपता और जीभ को वश में रखें।

आहार-विहार संयमित व अनुशासित

रहे। तले-भुने, तैलीय, चटपटे, गरिष्ठ

और भारी खाद्य पदार्थों से स्वयं को

दूर ही रखें। अधिक नमक, चीनी, मैदे

से बने पदार्थ, फास्ट फूड, जंक फूड,

मिठाइयां आदि से परहेज बरतना एक

स्वस्थ आदत है। आहार में फल, सब्जी

व सलाद को वरीयता देना जरूरी है।

एक बार में अधिक मात्रा में भोजन करने की बजाय दिनभर में 3-3 घंटे के अंतराल पर अल्प मात्रा में भोजन लेते रहना अच्छी व स्वास्थ्यपरक आदत है। रात में अधिक कार्बोहाइड्रेट व अधिक प्रोटीन वाला, गरिष्ठ और भरपेट भोजन न करें। संतुलित, पौष्टिक और भूख से कम मात्रा में ही आहार ग्रहण करने की आदत डालें

*अपने आहार में एक बार में 3 से अधिक खाद्य पदार्थ शामिल न करें*

चिकित्साशास्त्री मानते हैं कि आहार में एक बार में अधिक खाद्य पदार्थों को शामिल करने से उनका समुचित ढंग से पाचन नहीं हो पाता है, एसिडिटी अधिक बढ़ जाती है, जिससे गैस्ट्रिक की समस्या उत्पन्न होती है तथा आंतों को अधिक काम करना पड़ता है, जिससे उनकी सक्रियता धीरे-धीरे कम होने लगती है और स्थायी रूप से कब्ज की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

अल्कलाइन खाद्य पदार्थों का सेवन करना सेहत के लिए अच्छी आदत है। पी.एच. संतुलन के लिए 80 प्रतिशत क्षारीय तत्व और मात्र 20 प्रतिशत अम्लीय तत्व ही सबसे आदर्श मापदंड होता है।

*अच्छी तरह चबा-चबाकर भोजन करें*

अच्छी तरह चबा-चबाकर भोजन ग्रहण करना अच्छी आदत है। दांतों का काम आंतों से लेना हर हाल में नुकसानदेह होता है, इससे आवश्यक लार खाद्य सामग्रियों में मिल नहीं पाती, जिससे ठीक से पाचन नहीं हो पाता है। हड़बड़ी में, जल्दबाजी में भी कदापि भोजन नहीं करना चाहिए। चिंतित मनःस्थिति में कुछ भी खाना स्वास्थ्यवर्धक नहीं होता। मन से शांत होकर, प्रसन्न मन से पर्याप्त समय में ही भोजन करना अच्छी आदत मानी जाती है।

भोजन करते समय या भोजन करने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन करने के कम-से-कम डेढ़ घंटे बाद ही यथेष्ट मात्रा में पानी पीना अच्छी आदत है। रात्रि भोजन के बाद कम-से-कम 20 मिनट तक चहलकदमी जरूर करनी चाहिए। दिन के भोजन के उपरांत थोड़ी देर तक विश्राम करना स्वस्थ आदत है।

*प्राकृतिक और सहज जीवन जिएं*

कृत्रिमता से दूर रहें, प्रकृति की ओर लौटें। प्रकृति मां की तरह होती है, जो हर प्रकार से मनुष्य-शिशु की रक्षा का दायित्व लेती है। सहज रहना हमारा स्वभाव होता है, असहज तो हम स्वयं को बना लेते हैं। दोहरा चरित्र ही हमें असहजता की ओर ले जाता है। अतः मनसा, वाचा, कर्मणा हम एक समान बने रहें। व्यक्तित्व में दोहरापन न रहे, तो हमारी आयु कई वर्ष बढ़ जाती है।

दिन काम करने के लिए बना है और रात सोने के लिए-इसका ध्यान रखें। यही प्रकृति का नियम है। इसमें अपने स्तर पर किसी प्रकार का फेर-बदल करना शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक स्वास्थ्य के साथ सीधे-सीधे खिलवाड़ करना है। सादा जीवन, सादा रहन-सहन और उच्च सात्विक विचार

उत्तम स्वास्थ्य की कुंजी है।

*सदैव संतुष्ट रहें*

नहीं कुछ चाहिए, जो है पर्याप्त है-ऐसे भाव में डुबकी मारें। जो संतुष्ट है, उसे ही सब कुछ मिलता है। नतीजा मिलने में समय लगता है, अतः स्वयं को समय दें। कामयाबी तुरंत नहीं मिलती, कुछ भी प्राप्त करने में धैर्य का होना बहुत जरूरी है। जल्दी में कुछ प्राप्त करना चाहेंगे, तो कुछ भी प्राप्त नहीं होगा, अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। कुछ भी पाने के लिए अंदर से शांत रहना अति आवश्यक है। जीवन की समस्याओं के प्रति तटस्थ होकर साक्षी हो जाएं, दार्शनिक दृष्टि अपना लें।

अष्टावक्र गीता के अनुसार-“इस संसार में कौन-सा समय है, कौन-सी आयु ऐसी है जहां जीवन में द्वंद्व नहीं है। इन सबकी उपेक्षा करना और जो भी, जैसा भी प्राप्त है उसमें सहज रहना सबसे अच्छी आदत है।”

*डॉ अर्चना दुबे*, अध्यक्ष

अखंड एक्यूप्रेशर रिसर्च ट्रेंनिंग एंड ट्रीटमेंट इंस्टीट्यूट, प्रयागराज

 *अधिक जानकारी के लिए आप हमें इंस्टाग्राम एवं यूट्यूब पर भी फॉलो कर सकते हैं*

मेरे चैनल है-

*अर्चना दुबे एक्यूप्रेशर*

*अर्चना दुबे हेल्थ लैब*

Vedant Singh

Vedant Singh S/O Dr. Naveen Singh Mo. Belwadandi Po. Gandhi Nagar Basti Pin . 272001 Mob 8400883291 BG . O Positive vsvedant12345@gmail.com

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