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कर्पूरी ठाकुर जयंती आयोजन की सफलता–असफलता पर मंथन आवश्यक

 

 रिपोर्ट: डॉ. रामदयाल भाटी

 

किसी भी सामाजिक कार्यक्रम की घोषणा के बाद उसकी आलोचना करना उसे बाधित करना माना जा सकता है, लेकिन कार्यक्रम संपन्न होने के पश्चात उसकी सफलता या असफलता पर चिंतन और समालोचना करना समाज एवं आयोजकों—दोनों के लिए आवश्यक होता है।

हाल ही में भारतीय सेन समाज राजस्थान इकाई के नेतृत्व में जननायक कर्पूरी ठाकुर जयंती को राजधानी जयपुर में प्रदेश स्तर पर मनाने की घोषणा की गई। पहले आयोजन की तिथि 20 जनवरी प्रचारित की गई, बाद में कोटा बालिका छात्रावास के कार्यक्रम का हवाला देते हुए इसे संशोधित कर 27 जनवरी कर दिया गया। जबकि जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती 24 जनवरी को संपूर्ण भारत में मनाई जाती है। आयोजकों का कहना रहा कि मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए समय के अनुसार तिथियों में परिवर्तन किया गया।

हालांकि, तमाम प्रयासों के बावजूद आयोजन में न तो समाज की अपेक्षित और सम्मानजनक उपस्थिति रही और न ही मुख्यमंत्री कार्यक्रम में पहुंच सके। राजधानी जयपुर के बिडला ऑडिटोरियम, जिसकी कुल बैठक क्षमता 2000 से कम है, वह भी पूरी तरह नहीं भर पाया। राजधानी में आयोजित किसी भी समाज का कार्यक्रम सामान्यतः सर्व समाज में चर्चा का विषय बन जाता है, लेकिन इस आयोजन को लेकर समाज में निराशा देखने को मिली।

कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने भी स्वीकार किया कि यह आयोजन नेतृत्व की रणनीतिक विफलता का उदाहरण रहा। सामाजिक आयोजन चाहे किसी भी संगठन के बैनर तले हो, उसकी सफलता या असफलता से संपूर्ण समाज की छवि प्रभावित होती है। इतने सारे राष्ट्रीय अध्यक्षों, प्रदेशाध्यक्षों तथा सत्तासीन भाजपा संगठन के प्रदेश स्तरीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी के बावजूद समाज की भीड़ का न जुटना कई सवाल खड़े करता है।

तुलनात्मक रूप से, 5 मार्च 2013 को आयोजित नाई जागृति महासम्मेलन में बिना किसी मुख्यमंत्री या बड़े राजनीतिक चेहरे के पूरे प्रदेश से लगभग 70 हजार लोगों की उपस्थिति दर्ज हुई थी। यह समाज और संगठन की एकजुटता का स्पष्ट उदाहरण था। आज स्थिति यह है कि अन्य समाजों की रैलियों में भाजपा और कांग्रेस के बड़े नेता शिरकत करने को उत्सुक रहते हैं, जबकि हमारा समाज स्वयं के कार्यक्रमों में अपेक्षित मजबूती नहीं दिखा पा रहा।

आरोप यह भी सामने आए कि समाज के कई नेता केश कला बोर्ड के चेयरमैन पद की दौड़ में सामाजिक हितों और समाज के सम्मान को हाशिए पर डाल चुके हैं। समाज की मांगों की आड़ में व्यक्तिगत स्वार्थ साधने की प्रवृत्ति सामाजिक एकता को कमजोर कर रही है। जहां सामाजिक संस्थाओं का नेतृत्व राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित हो जाता है, वहां ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

यदि इस पिछड़े समाज को वास्तव में उत्थान और विकास के मार्ग पर ले जाना है, तो समाज के नेताओं को व्यक्तिगत स्वार्थ त्यागकर समाजहित का पैरोकार बनना होगा। जन-जागरण के माध्यम से आम समाजजन को सामाजिक संगठनों से जोड़ना आवश्यक है, ताकि समाज एकजुट होकर अपने आयोजनों को मजबूती प्रदान कर सके।

Dr Ram Dayal Bhati

Editor Rajasthan Mobile Number 97848 14914

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