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यूजीसी के नए जातिगत नियमों पर सवाल, “समानता या सियासत?”—ज्ञापन में सामान्य वर्ग की चिंता उजागर।

ब्यूरो चीफ मुकेश कुमार शर्मा

 

 

भिवाड़ी में यूजीसी कानून में प्रस्तावित बदलावों को लेकर विरोध के स्वर अब तेज होने लगे हैं। जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से बनाए जा रहे नए नियमों पर सवाल उठाते हुए एक ज्ञापन के माध्यम से सरकार से पुनर्विचार की मांग की गई है। ज्ञापन में कहा गया है कि देश में पहले से ही भारतीय न्याय संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, एंटी-रैगिंग नियम और एससी/एसटी एक्ट जैसे सख्त कानून लागू हैं, ऐसे में नए जातिगत नियमों की आवश्यकता क्या है।

ज्ञापन में स्पष्ट किया गया कि जातिगत भेदभाव निस्संदेह देश के लिए एक गंभीर सामाजिक नासूर है और ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन निर्दोषों को भी कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए। आरोप लगाया गया कि नए नियमों में सामान्य वर्ग को पहले से ही संदेह के घेरे में खड़ा किया जा रहा है, जिससे कानून के दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है।

ज्ञापन में यह भी सवाल उठाया गया कि यदि कोई ओबीसी वर्ग का छात्र एससी/एसटी वर्ग से भेदभाव करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान क्यों नहीं है, जबकि भेदभाव के मामले वहां भी सामने आते हैं। इसके साथ ही 2012 के नियमों का हवाला देते हुए कहा गया कि उस समय झूठे आरोप साबित होने पर जुर्माने का प्रावधान था, जिसे नए नियमों से हटा दिया गया है।

मांग की गई कि नए कानून समानता और संविधान की भावना पर आधारित हों, न कि राजनीतिक नजरिये पर। साथ ही जांच समितियों में सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों को शामिल कर पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। ज्ञापन में सरकार से अपील की गई है कि कानून ऐसा हो जो जातियों के बीच दीवारें खड़ी करने के बजाय न्याय और समानता को मजबूत करे।

Viyasmani Tripaathi

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