कविताएं
वो इसलिए अच्छा लगता है

लेखिका: अंजली पाण्डेय
जब-जब दिल ये पूछे,
“वो तुम्हें कैसा लगता है?”
हर बार यही दिल कहता है—
“वो सबसे अच्छा लगता है।”
चाँद जैसी जिसमें हो ठंडक,
सूरज जैसी जिसमें हो चमक।
खुशबू जैसी जिसकी साँसें हों,
बिजली जैसी जिसमें हो गरज।
अहम नहीं, पर पुरुषार्थ का,
और न हो उसमें केवल सूरत का।
दुर्लभ परिस्थितियों में भी,
साथ न छोड़े सच्चे साथी का।
बातों से कहीं ज्यादा,
उसका अंदाज़ अच्छा लगता है।
हर बार वो मुझे
पहले से कहीं ज्यादा अच्छा लगता है।
वो देता है मुझे दुलार,
मेरी नादानियों से भी करता प्यार।
उसकी तहज़ीब को मैंने मान लिया,
और उसे अपनाया अपने संसार में।
अ़रों में उसके क्रोध नहीं,
मुझे उसमें रोष नहीं दिखता।
जबसे मैंने उसे पाया,
अब बाकी कुछ भी शेष नहीं।
उसके रोमांस से कहीं ज्यादा,
उसकी शफ़क़त अच्छी लगती है।
हर बार वो मुझे
पहले से कहीं ज्यादा अच्छा लगता है।
जब-जब दिल ये पूछे,
“वो तुम्हें कैसा लगता है?”
हर बार यही दिल कहता है—
“वो सबसे अच्छा लगता है।”
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