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चांदी-नकदी से भरा बैग मिला, मगर नहीं डोला इरफान का ईमान-मानवता की मिसाल बना पुराना भीलवाड़ा

संवाददाता दशरथ माली
🛑 *- ईमान अब भी ज़िंदा है…*
*चांदी-नकदी से भरा बैग मिला, मगर नहीं डोला इरफान का ईमान-मानवता की मिसाल बना पुराना भीलवाड़ा*
भीलवाड़ा। आज के दौर में जब सड़कों पर पड़ा पर्स या बैग अक्सर नियत की परीक्षा बन जाता है, तब *इरफान लुहार पुत्र हाजी फरीद जी चौधरी* ने यह साबित कर दिया कि ईमानदारी कोई भूली-बिसरी कहानी नहीं, बल्कि आज भी ज़िंदा सच है। चांदी के गहने, 10 हजार रुपये नकद, एटीएम कार्ड और ज़रूरी दस्तावेज—सब कुछ सामने था, लेकिन इरफान की नज़र सिर्फ इंसानियत पर टिकी रही।
*बैग मिला, नीयत नहीं बदली*
पुराने भीलवाड़ा के गुलमंडी क्षेत्र में, गुलमंडी जामा मस्जिद के गेट के बाहर नमाज़ से लौटते समय इरफान को एक लावारिस बैग मिला। बैग खोला गया-अंदर नकदी, चांदी के गहने, एटीएम और दस्तावेज़ थे। ऐसे में जहां अक्सर लोग चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं, इरफान ने वहीं रुककर सही काम करने का फैसला किया। बैग में मिले आधार कार्ड से नाम सामने आया-निशा सोनी। इरफान ने गुलमंडी के सर्राफा व्यापारियों की मदद ली, पता लगाया, संपर्क किया और पहचान की पूरी तसल्ली के बाद बैग सुरक्षित हाथों में सौंप दिया।
*“मैंने तो उम्मीद छोड़ दी थी…”*
बैग वापस पाकर निशा सोनी की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा- मैंने हर रास्ता, हर दुकान, हर मोड़ छान लिया था। जब कहीं बैग नहीं मिला, तो घर के दरवाज़े पर बैठकर किस्मत को कोसने लगी। उम्मीद छोड़ चुकी थी। लेकिन *भाई इरफान लुहार* की ईमानदारी ने मेरा भरोसा लौटा दिया। ऐसे लोग समाज की असली पूंजी होते हैं। मैं तहेदिल से उनका आभार व्यक्त करती हूं।
*एक छोटी-सी घटना, बड़ा संदेश*
यह कहानी सिर्फ एक खोए बैग के मिलने की नहीं है। यह उस भरोसे की कहानी है, जो आज भी समाज की धड़कनों में ज़िंदा है। यह उस ईमान की कहानी है, जो पैसों से नहीं डोलता। *इरफान लुहार पुत्र हाजी फरीद चौधरी* ने यह साबित कर दिया कि सच्ची दौलत जेब में नहीं, किरदार में होती है। आज गुलमंडी ही नहीं, पूरा भीलवाड़ा कह रहा है- सलाम है ऐसी ईमानदारी को, सलाम है ऐसी इंसानियत को।
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