शायरी
कुछ सच, कुछ तजुर्बे, कुछ खामोशियाँ

✍️ रचना: अंजली पाण्डेय
तेरे उन तल्ख़ कलामों की रौशनी ऐसी थी,
जिसमें मुझे मेरी ही ग़ैरत नज़र आने लगी।
वो जो साथ रहकर भी हाल-ए-दिल न जान सके,
मैं गुनाह समझती हूँ ऐसे लोगों को अपना हाल बताना।
बरसों बाद देखा मैंने खुद को, खुद के साथ,
चल, तेरे जाने का मुझे कुछ तो फायदा हुआ।
हम तो झूठ में ही खुद को दोष दे रहे थे,
ये इश्क़ का खेल तो पहले से ही हुस्न वालों ने जीत रखा है।
मेरा भरोसा कैसे न उठे इश्क़ से,
जब मैंने अपने कहने वालों को किसी और के साथ जाते देखा।
शुरुआत अच्छी हो तो सब धीरे-धीरे अच्छा होता चला जाता है,
जिसने यहाँ तक का रास्ता बनाया है, वो आगे का भी रास्ता बनाएगा।
दिल के तूफ़ान का यूँ थम जाना ही ठीक है,
इश्क़-ए-आरज़ू का मर जाना ही ठीक है।
मोहब्बत-ए-पोशीदा हटी तो एहसास हुआ,
तुम्हारे दिए वो चंद लम्हे — इश्क़ नहीं, भीख थे।
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