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बालोतरा रामद्वारा में रामकथा का सप्तम दिवस, श्रीराम के वनगमन प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन

ब्यूरो चीफ सन्तोष कुमार गर्ग
बालोतरा।
बालोतरा स्थित रामद्वारा में चल रही संगीतमय रामकथा के सप्तम दिवस संत श्री सुखराम जी महाराज ने श्रीराम के वनगमन प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण और मधुर वाणी में वर्णन किया। कथा की शुरुआत श्रीरामचरितमानस की आरती के साथ हुई।
संत श्री सुखराम जी ने कथा में बताया कि भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह के पश्चात अयोध्या में लगभग 12 वर्षों तक उत्सव का वातावरण रहा। एक दिन राजा दशरथ ने अपने सिर में सफेद बाल देखकर श्रीराम को युवराज बनाने का निर्णय लिया और गुरु वशिष्ठ जी की आज्ञा से इसकी तैयारी शुरू कर दी।
इसी दौरान कैकेयी की दासी मंथरा ने रानी कैकेयी को भड़काकर राजा दशरथ से दो वरदान मांगने के लिए प्रेरित किया। रानी कैकेयी ने पहला वरदान भरत को राजतिलक और दूसरा वरदान श्रीराम को 14 वर्षों के वनवास का मांगा। यह सुनकर राजा दशरथ मूर्छित होकर गिर पड़े। मंत्री सुमंत ने श्रीराम को बुलाकर पूरी स्थिति से अवगत कराया।
पिता के वचन का पालन करते हुए श्रीराम ने तुरंत वन जाने का निर्णय लिया। उनके साथ माता सीता और लक्ष्मण भी वन जाने को तैयार हो गए। इस प्रकार तीनों ने वन की ओर प्रस्थान किया। गंगा तट पर केवट ने उन्हें गंगा पार करवाई। आगे चलकर श्रीराम चित्रकूट पहुंचे और वहीं अपना निवास बनाया। इसी प्रसंग के साथ सप्तम दिवस की कथा का विश्राम हुआ।
इस अवसर पर संगीतकार हरीश भाई, पवन भाई, अंकुर भाई सहित सुरेश जी सराफ, अशोक जी गोयल, सुश्री सुखी गोयल, पुखराज जी सिंघल, श्रीमती संतोष सराफ सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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