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अष्टांग योग में ‘तप’ का महत्व: आत्मिक उन्नति और समाज कल्याण का मार्ग – डॉ नवीन सिंह

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती। अष्टांग योग के नियम विभाग के अंतर्गत ‘तप’ की महत्ता पर योगाचार्य डॉ. नवीन सिंह ने योग प्रेमियों को विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने महर्षि पतंजलि के सूत्र “तपः द्वंद्वो सहनम्” का उल्लेख करते हुए बताया कि जीवन में आने वाले द्वंद्वों—सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, मान-अपमान—को ईश्वर पर अटल विश्वास रखते हुए सहन करना ही तप है।
डॉ. सिंह ने कहा कि तप का उद्देश्य केवल शारीरिक कष्ट सहना नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति और मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होना है। व्यक्ति जब इन द्वंद्वों को धैर्यपूर्वक सहन करता है, तो उसका चित्त शुद्ध होता है और वह आत्मविकास की दिशा में आगे बढ़ता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देश और समाज के कल्याण हेतु कठिनाइयों को सहन करना भी तप की श्रेणी में आता है।
योगाचार्य ने बताया कि ज्ञान-विज्ञान, क्रिया-कौशल और पराक्रम-पुरुषार्थ अर्जित करने की प्रक्रिया में व्यक्ति अनेक कठिन परिस्थितियों से गुजरता है। यदि आगे चलकर वह इन अर्जित गुणों का उपयोग समाज और देश के सृजन, विकास एवं कल्याण में करता है, तो यह तप का श्रेष्ठ रूप कहलाता है। इसके विपरीत, यदि व्यक्ति इन साधनों का दुरुपयोग कर अपने या समाज के विनाश का कारण बनता है, तो उसे कृतघ्नता की श्रेणी में रखा जाता है।
उन्होंने कहा कि ईश्वर द्वारा प्रदत्त सभी साधन जीव की उन्नति के लिए हैं। इनका सदुपयोग व्यक्ति को प्रशंसनीय बनाता है, जबकि दुरुपयोग उसे निंदनीय। तप के नियमित अनुष्ठान से व्यक्ति धीरे-धीरे दुखों से मुक्त होने लगता है, उसकी सहनशक्ति बढ़ती है और वह महापराक्रमी बनता है। साथ ही क्रोध और मनोभावनाओं पर नियंत्रण की शक्ति भी विकसित होती है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. नवीन सिंह ने योग साधकों से निरंतर अभ्यास और संयम का आह्वान किया तथा बताया कि आगामी सत्र में अष्टांग योग के नियम विभाग के अंतर्गत ‘स्वाध्याय’ विषय पर चर्चा की जाएगी।
पतंजलि योग पीठ, हरिद्वार यूनिट बस्ती
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