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सर्व व्यापी को खोजने की नहीं, पहचानने की आवश्यकता है-मुक्तामणि शास्त्री 

9 दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा

बस्ती से वेदान्त सिंह

 

बस्ती । जिसका जीवन शुद्ध और पवित्र है उसी को भजनानन्द मिलता है। जो पवित्र जीवन जीता है उसे ही ईश्वर का ज्ञान मिलता है। सुनीति का फल धु्रव है। जो नीति के अधीन रहेगा उसे ब्रम्हानन्द प्राप्त होता है। यह सद् विचार मुक्तामणि शास्त्री महाराज ने दुर्गा नगर आदर्श परिवार कटरा में तीसरे दिन व्यास पीठ से व्यक्त किया।

महात्मा जी ने कहा कि राजा उत्तानपाद के दो रानियां और दो पुत्र थे, राजा को सुनीति नहीं सुरूचि ही प्यारी थी। सुरूचि का पुत्र राजा की गोद में बैठा था धु्रव ने भी पिता से अपनी गोद में बिठाने के लिये कहा। धु्रव को राजा गोद में बिठाये यह सुरूचि को पसन्द नहीं था। राजा ने सोचा की धु्रव को गोद में बिठाऊंगा तो रानी नाराज हो जायेगी। राजा ने धु्रव की अवहेलना की और मुख मोड़ लिया। धु्रव की मां सुनीति ने धु्रव से कहा कि मांगना ही है तो ठाकुर जी से मागो। मैने तुझे नारायण को सौंप दिया है। जो पिता तेरा मुंह तक नहीं देखना चाहता उसके घर पर रहना निरर्थक है। धुव अपनी विमाता से भी आशीर्वाद लेकर वन की ओर चल पड़ा। महात्मा जी ने कहा कि 5 वर्ष के बालक धु्रव को माता सुनीति तप के लिये भेजती है और आज कल की मातायें पुत्रों को सिनेमा देखने के लिये भेजती है।

धु्रव तपस्या का वर्णन करते हुये महात्मा जी ने कहा कि बालक माता के दोष के कारण चरित्रहीन, पिता के दोष के कारण मूर्ख, वंश दोष के कारण कायर और स्वयं दोष के कारण दरिद्र होता है। अधिकारी शिष्य को मार्ग में ही गुरू मिल जाते हैं। परमात्मा और सद्गुरू दोनो व्यापक है। सर्व व्यापी को खोजने की नहीं, पहचानने की आवश्यकता है। नारद जी की प्रेरणा से भक्त धु्रव ने वृन्दावन में यमुना नदी के तट पर मधुवन में उपासना आरम्भ किया। भक्त धु्रव ने घोर तपस्या किया और जब देवगण ने नारायण से प्रार्थना किया कि आप धु्रव कुमार को शीघ्र दर्शन दीजिये तो भगवान ने देवो से कहा मैं धु्रव को दर्शन देने नहीं स्वयं धु्रव का दर्शन करने जा रहा हूं। धु्रव को दर्शन देते हुये भगवान ने कहा तू कुछ कल्पो के लिये राज्य का शासन कर इसके पश्चात तुझे अपने धाम में ले चलूंगा। महात्मा जी ने कहा कि परमात्मा जिसे अपना बनाता है शत्रु भी उसकी बन्दना करते हैं। जो ईश्वर से सम्बन्ध जोड़ लेता है जगत उसी के पीछे दौड़ने लगता है। राजा उत्तानपाद ने पुत्र धु्रव को गले से लगा लिया और माता सुनीति को लगा कि आज ही वह पुत्रवती हुई है क्योंकि उसका पुत्र भगवान को प्राप्त करके आया है। धुव्र ने भगवान की शरणागति स्वीकार किया तो भगवान ने उनको दर्शन, राज्य और वैकुण्ठवास भी दिया।

श्रीमद्भागवत कथा के क्रम में आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रमोद कुमार पाण्डेय, उपाध्यक्ष राकेश कुमार पाण्डेय आदि ने विधि विधान से कथा व्यास का पूजन अर्चन किया। श्रोताओं में मुख्य रूप से भगवान प्रसाद तिवारी, , रामचंद्र वर्मा, फूल चंद्र पांडेय, सर्वेश यादव, करीम खान कृष्ण मणि ओझा, जितेन्द्र पाडेय, विशाल ओझा, विवेक, बबलू यादव, यश पाण्डेय, सतीश चन्द्र मिश्र, राजेन्द्र सिंह, सुनील कुमार आर्या, राजेन्द्र पाण्डेय, रामचन्द्र वर्मा, कृष्ण कुमार तिवारी, दिनेश पाण्डेय ‘बब्लू’, सर्वेश यादव, राकेश पाण्डेय पिन्टू, उपेन्द्र पाण्डेय, जितेन्द्र पाण्डेय, अमरेन्द्र उपाध्याय, बुद्धि सागर ‘बब्लू’ के साथ ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिलायें, भक्त शामिल रहे।

Vedant Singh

Vedant Singh S/O Dr. Naveen Singh Mo. Belwadandi Po. Gandhi Nagar Basti Pin . 272001 Mob 8400883291 BG . O Positive vsvedant12345@gmail.com

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