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कुंडलिनी: मानव चेतना की सुप्त शक्ति को जाग्रत करने वाली दिव्य साधना – प्रो.डॉ.नवीन सिंह

बस्ती से वेदान्त सिंह
बस्ती। कुंडलिनी योग साधना मानव चेतना के गहरे रहस्यों को उजागर करने वाली प्राचीन विद्या है। योगशास्त्रों में वर्णित कुंडलिनी शक्ति को एक प्रचंड ऊर्जा माना गया है, जो मानव शरीर के मूलाधार चक्र के नीचे सर्पाकार मुद्रा में साढ़े तीन कुंडल बनाकर सुप्त अवस्था में स्थित रहती है। इन तीन कुंडलों को क्रमशः सत्व (परिशुद्धता), रजस (क्रियाशीलता व वासना) और तमस (जड़ता व अंधकार) के प्रतीक रूप में बताया गया है, जबकि अर्द्ध-कुंडल को इन तीनों गुणों के संयुक्त प्रभाव का परिचायक माना गया है।
विश्व संवाद परिषद (योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ) के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने बताया कि निरंतर और शुद्ध कुंडलिनी योग साधना के माध्यम से इस सुप्त शक्ति को जाग्रत कर सुषुम्ना नाड़ी में स्थित सातों चक्रों का भेदन कराया जाता है। चक्र भेदन के दौरान साधक प्रत्येक चक्र की ऊर्जा का अनुभव करता है तथा वह चक्र-संबंधी शक्तियों का स्वामी भी बन जाता है। अंततः यह ऊर्जा सहस्रार चक्र में स्थित सदाशिव में विलीन होकर साधक को ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ देती है।
मानव शरीर में 72 हजार सूक्ष्म नाड़ियों का उल्लेख मिलता है, जिनमें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। इड़ा और पिंगला मेरुदंड के दोनों ओर स्थित होकर क्रमशः बाईं (चंद्र—शीतल) और दाईं (सूर्य—उष्ण) नासिका से अपना प्रवाह संचालित करती हैं। डॉ. सिंह के अनुसार, “जब सांस दोनों नासिकाओं से समान रूप से प्रवाहित होती है, उस समय सुषुम्ना नाड़ी सक्रिय होती है। यह वह अवस्था है जब मन, शरीर और चेतना सर्वश्रेष्ठ कार्य करने के लिए पूर्णरूपेण संतुलित होते हैं।”
सुषुम्ना नाड़ी मूलाधार से सहस्रार चक्र तक स्थित मानी गई है और इसे सरस्वती नाड़ी भी कहा गया है। नाड़ियों के संगम पर ऊर्जा केंद्र बनते हैं जिन्हें कमल-पुष्प स्वरूप चक्रों के रूप में दर्शाया गया है। प्रत्येक चक्र में मौजूद बीजाक्षर विशिष्ट स्पंदन उत्पन्न करते हैं, जो कुंडलिनी शक्ति के चक्र-भेदन के दौरान सक्रिय होते हैं।
डॉ. नवीन सिंह ने बताया कि जैसे-जैसे कुंडलिनी शक्ति चक्रों को भेदती हुई ऊपर की ओर बढ़ती है, साधक को उसके जागरण के स्पष्ट संकेत मिलने लगते हैं। यह ऊर्जा सूर्य के समान प्रकाशमान एवं तेजस्वी मानी जाती है, जिसके कारण साधक के भीतर अद्भुत परिवर्तन और तेज का विकास होने लगता है।
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प्रो. डॉ. नवीन सिंह
राष्ट्रीय महासचिव
विश्व संवाद परिषद (योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ), भारत

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