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चमत्कारों से नहीं, विज्ञान और शिक्षा से बनेगा महान भारत: बाबाओं की बढ़ती लोकप्रियता पर उठे सवाल

नीम करौली बाबा की ट्रेन रोकने वाली चर्चित कहानी से लेकर सोशल मीडिया पर बढ़ते चमत्कारों के प्रचार तक, आस्था और वैज्ञानिक सोच को लेकर नई बहस

राजस्थान हेड डॉ राम दयाल भाटी

भारत में संतों, बाबाओं और धार्मिक गुरुओं के प्रति लोगों की आस्था सदियों पुरानी रही है। लेकिन बदलते दौर में सोशल मीडिया पर चमत्कारों की कहानियों और धार्मिक व्यक्तित्वों की बढ़ती लोकप्रियता ने एक नई बहस को जन्म दिया है। सवाल उठ रहा है कि क्या समाज को चमत्कारों की कहानियों से अधिक विज्ञान, शिक्षा, शोध और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है?

नीम करौली बाबा की चर्चित कहानी पर सवाल

नीम करौली बाबा से जुड़ी एक प्रचलित कथा के अनुसार, अंग्रेजों के शासनकाल में उनके ट्रेन से उतरने के बाद रेलगाड़ी आगे नहीं बढ़ सकी थी। हालांकि, इस कहानी को प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए पर्याप्त स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।

इसी कहानी को लेकर तर्कवादी दृष्टिकोण से एक सवाल उठाया जा रहा है कि यदि किसी संत के पास अंग्रेजों की ट्रेन रोकने जैसी अलौकिक शक्ति थी, तो उस शक्ति का इस्तेमाल देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए क्यों नहीं हुआ?

यह सवाल किसी की व्यक्तिगत आस्था को ठेस पहुंचाने के बजाय चमत्कारों के दावों को ऐतिहासिक और वैज्ञानिक कसौटी पर परखने की आवश्यकता को सामने रखता है।

क्या सोशल मीडिया के दौर में आस्था भी बन रही है ट्रेंड?

सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच अलग-अलग धार्मिक गुरुओं और आस्था केंद्रों से जुड़ी कहानियां तेजी से वायरल होती हैं। कभी साईं बाबा, कभी नीम करौली बाबा तो कभी अन्य संतों और धार्मिक स्थलों से संबंधित वीडियो लाखों लोगों तक पहुंचते हैं।

इसी प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हुए आलोचकों का कहना है कि समाज के एक वर्ग में धार्मिक आस्था भी सोशल मीडिया ट्रेंड से प्रभावित होती दिखाई दे रही है।

हालांकि, किसी संत या धार्मिक परंपरा की लोकप्रियता अपने आप में उसके दावों की सत्यता अथवा असत्यता का प्रमाण नहीं है। आस्था व्यक्तिगत विषय है, लेकिन सार्वजनिक रूप से किए जाने वाले चमत्कारों के दावों की तार्किक जांच भी उतनी ही जरूरी है।

दुनिया विज्ञान में आगे बढ़ रही है, हमें भी शोध पर देना होगा जोर

चीन, जापान, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, फिनलैंड, स्वीडन, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे देशों ने विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार को अपनी विकास नीतियों में महत्वपूर्ण स्थान दिया है।

इन देशों में वैज्ञानिक नई तकनीकों, आधुनिक चिकित्सा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में लगातार काम कर रहे हैं।

ऐसे में भारत के सामने भी एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या नई पीढ़ी को चमत्कारों की कहानियों से अधिक वैज्ञानिक खोजों, प्रयोगशालाओं और नवाचार के लिए प्रेरित करने की जरूरत नहीं है?

भारत ने भी अंतरिक्ष विज्ञान, चिकित्सा, डिजिटल तकनीक और अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। आवश्यकता इन उपलब्धियों को आगे बढ़ाने और बच्चों तथा युवाओं में वैज्ञानिक सोच विकसित करने की है।

आस्था अपनी जगह, लेकिन सवाल पूछना भी जरूरी

किसी धार्मिक गुरु का सम्मान करना या किसी परंपरा में विश्वास रखना व्यक्ति की स्वतंत्रता है। लेकिन बिना प्रमाण किसी चमत्कार को ऐतिहासिक या वैज्ञानिक सत्य मान लेना अलग विषय है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(h) में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा ज्ञानार्जन और सुधार की भावना विकसित करना नागरिकों के मूल कर्तव्यों में शामिल है।

समाज को ऐसी सोच की जरूरत है, जहां धार्मिक आस्था के साथ तर्क, प्रमाण और सवाल पूछने की स्वतंत्रता भी बनी रहे।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर केवल चमत्कारों से ही देश महान बन सकते, तो वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, शिक्षकों और शोधकर्ताओं की आवश्यकता क्यों पड़ती?

देश का भविष्य चमत्कारों के अप्रमाणित दावों में नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, मेहनत, नवाचार और जागरूक नागरिकों के निर्माण में तलाशना होगा।

Dr Ram Dayal Bhati

Editor Rajasthan Mobile Number 97848 14914

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