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जल सुरक्षा, वन संरक्षण और पर्यावरणीय स्थिरता पर आधारित हो जम्मू-कश्मीर का विकास मॉडल: जावेद अहमद राणा
आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी, हिमालयी क्षेत्रों के लिए सतत पर्वतीय विकास नीति का किया समर्थन श्रीनगर में 13वें सतत पर्वतीय विकास शिखर सम्मेलन में बोले मंत्री राणा— आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

रिपोर्ट: राजेश कुमार | श्रीनगर, 14 अक्टूबर 2026
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के जल शक्ति, वन, पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण तथा जनजातीय मामलों के मंत्री जावेद अहमद राणा ने हिमालयी क्षेत्रों के विकास में जल सुरक्षा, वन संरक्षण और पर्यावरणीय स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की दीर्घकालिक समृद्धि के लिए आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना बेहद आवश्यक है।
मंत्री राणा बुधवार को शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कश्मीर (SKUAST-Kashmir) के शालीमार परिसर में आयोजित 13वें सतत पर्वतीय विकास शिखर सम्मेलन (SMDS-2026) को संबोधित कर रहे थे।
यह तीन दिवसीय सम्मेलन 12 से 14 अक्टूबर तक SKUAST-कश्मीर और इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव (IMI) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। इसमें देशभर के पर्वतीय क्षेत्रों से वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों और सामुदायिक नेताओं ने भाग लिया।
हिमालय केवल पर्वत श्रृंखला नहीं, करोड़ों लोगों की जीवनरेखा
सम्मेलन की थीम ‘समावेशी विकसित भारत के लिए सतत हिमालयी परिदृश्य का निर्माण’ पर अपने विचार रखते हुए मंत्री राणा ने कहा कि हिमालय केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन और पर्यावरण को बनाए रखने वाली महत्वपूर्ण पारिस्थितिक जीवनरेखा है।
उन्होंने कहा कि हिमालय के जंगल, ग्लेशियर, नदियां, प्राकृतिक जलस्रोत और समृद्ध जैव विविधता कृषि, बागवानी, पर्यटन सहित अनेक आजीविका गतिविधियों का आधार हैं। ये प्राकृतिक संसाधन जल प्रवाह को नियंत्रित करने और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राणा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को ऐसे विकास मॉडल की आवश्यकता है, जो आर्थिक अवसरों को बढ़ावा देने के साथ स्थानीय लोगों की आजीविका मजबूत करे और सार्वजनिक सुविधाओं में सुधार लाए, लेकिन हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी को नुकसान न पहुंचाए।
जल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की आवश्यकता
जल संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए मंत्री राणा ने कहा कि सतत पर्वतीय विकास के लिए जल सुरक्षा हमारी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल होनी चाहिए।
उन्होंने प्राकृतिक जलस्रोतों और झरनों के संरक्षण एवं पुनर्जीवन, जलग्रहण क्षेत्रों की सुरक्षा, वर्षा जल संचयन, पानी के कुशल उपयोग तथा पेयजल स्रोतों की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल पेयजल आपूर्ति का बुनियादी ढांचा विकसित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और पुनर्भरण भी उतना ही जरूरी है, जिन पर पूरी जलापूर्ति व्यवस्था निर्भर करती है।
राणा ने कहा कि प्रत्येक नागरिक तक सुरक्षित और समान रूप से पेयजल पहुंचाने के लिए नदियों, झरनों और भूजल स्रोतों को संरक्षित रखना आवश्यक है।
वन संरक्षण के बिना संभव नहीं पर्यावरणीय संतुलन
मंत्री ने जंगलों, जल संसाधनों और पारिस्थितिक स्थिरता के बीच गहरे संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि वन संरक्षण को क्षेत्रीय विकास रणनीति का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि स्वस्थ वन और सुव्यवस्थित जलग्रहण क्षेत्र जलस्रोतों को बनाए रखने, जैव विविधता की रक्षा करने, भूमि क्षरण रोकने तथा पर्वतीय समुदायों को पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाने के लिए आवश्यक हैं।
राणा ने पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क, भवन और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की योजना बनाते समय वहां की भौगोलिक परिस्थितियों, संवेदनशील पर्यावरण, सीमित प्राकृतिक संसाधनों और आपदाओं के जोखिम को ध्यान में रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
जम्मू-कश्मीर की प्रस्तावित सतत पर्वतीय विकास नीति का समर्थन
सम्मेलन के दौरान मंत्री राणा ने प्रस्तावित ‘जम्मू-कश्मीर सतत पर्वतीय विकास नीति’ पर चल रहे विचार-विमर्श का स्वागत किया।
इस नीति का पहला मसौदा इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव (IMI) और SKUAST-कश्मीर द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया है, जिसकी वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ समीक्षा कर रहे हैं।
उन्होंने इसे जम्मू-कश्मीर के लिए एक महत्वपूर्ण पहल बताते हुए कहा कि यह नीति पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन और समावेशी आर्थिक विकास को एक साझा ढांचे में लाने में सहायक साबित हो सकती है।
प्रस्तावित नीति में पारिस्थितिक वहन क्षमता, पर्वतीय परिस्थितियों के अनुकूल भूमि उपयोग, जिम्मेदार पर्यटन, आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे, प्रभावी कचरा प्रबंधन, जलग्रहण एवं प्राकृतिक जलस्रोतों की सुरक्षा, आपदा जोखिम में कमी और टिकाऊ आजीविका जैसे महत्वपूर्ण विषयों को प्राथमिकता दी गई है।
विकास का वास्तविक पैमाना परियोजनाओं की संख्या नहीं, लोगों का जीवन स्तर
मंत्री जावेद अहमद राणा ने कहा कि विकास की वास्तविक सफलता केवल पूरी की गई परियोजनाओं की संख्या से नहीं आंकी जानी चाहिए, बल्कि इस बात से तय होनी चाहिए कि लोगों के जीवन स्तर में कितना सुधार हुआ और भविष्य की पीढ़ियों के लिए कितनी प्राकृतिक विरासत सुरक्षित रखी गई।
उन्होंने कहा कि विकास का ऐसा मॉडल अपनाना होगा, जिसमें आम नागरिक और पर्यावरण दोनों केंद्र में हों।
राणा ने प्रत्येक गांव तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाने, जंगलों और जैव विविधता की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा युवाओं को अपने ही क्षेत्रों में स्थायी आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता जताई।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ही सफल होगा सतत विकास
मंत्री ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों के सतत विकास के लिए स्थानीय समुदायों, वैज्ञानिक संस्थानों, नीति निर्माताओं और सामाजिक संगठनों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
उन्होंने सभी हितधारकों से प्राकृतिक संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग, संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने में सक्षम पर्वतीय अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए सामूहिक प्रयास करने का आह्वान किया।
राणा ने विश्वास व्यक्त किया कि इस शिखर सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श से व्यावहारिक और दूरदर्शी सुझाव सामने आएंगे, जो जम्मू-कश्मीर सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र के समावेशी, जलवायु-अनुकूल और सतत विकास के लिए स्पष्ट कार्ययोजना तैयार करने में सहायक होंगे।
कार्यक्रम के अंत में मंत्री ने आयोजकों, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों को शुभकामनाएं देते हुए आशा व्यक्त की कि सम्मेलन के निष्कर्ष ठोस नीतिगत सिफारिशों और प्रभावी कार्ययोजनाओं में परिवर्तित होंगे, जिससे हिमालयी क्षेत्र का भविष्य सुरक्षित और समृद्ध बनाया जा सकेगा।

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