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योग: प्रदर्शन नहीं आत्मदर्शन का माध्यम — योगाचार्य सुमित कुमार सिंह

 

(डॉ. नवीन सिंह वेदांत टाइम्स)

वर्तमान समय में योग जहाँ एक ओर वैश्विक स्तर पर लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच चुका है, वहीं दूसरी ओर इसकी मूल आत्मा संकट के दौर से गुजर रही है। योग अब स्वास्थ्य, संतुलन और आत्मबोध की साधना के बजाय शरीर को अधिक जटिल और कठिन आसनों में ढालने के प्रदर्शन तक सीमित होता जा रहा है।

यह विचार योगाचार्य सुमित कुमार सिंह, संस्थापक एवं सचिव, अष्टांगपथ योगपीठ तथा जिला सचिव, उत्तर प्रदेश योगासन स्पोर्ट एसोसिएशन (योगासन भारत) ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज योग को इस दृष्टि से देखा जाने लगा है कि जो साधक जितना अधिक कठिन और एडवांस आसन कर ले, वही श्रेष्ठ योगी है, जबकि यह धारणा योग के मूल दर्शन से पूर्णतः विपरीत है।

🧘‍♂️ एडवांस आसन: आवश्यकता, न कि अनिवार्यता

योगाचार्य सुमित कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि योगशास्त्र में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं बताया गया कि प्रत्येक साधक को जटिल या उन्नत आसनों का अभ्यास करना ही चाहिए। एडवांस आसन केवल उन लोगों के लिए उपयुक्त हैं, जिनकी आयु, शारीरिक क्षमता, अभ्यास स्तर और उद्देश्य इसकी मांग करते हैं। सभी के लिए एक समान अभ्यास लागू करना योग नहीं, बल्कि अविवेक है।

⚖️ योगासन खेल और स्वास्थ्य योग में अंतर

उन्होंने बताया कि योगासन खेल या जिमनास्टिक से जुड़े खिलाड़ियों के लिए कठिन आसन उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि उनका शरीर वैज्ञानिक प्रशिक्षण और चिकित्सकीय निगरानी में तैयार होता है। लेकिन जब यही अभ्यास सामान्य लोगों पर थोपे जाते हैं, तो यह योग साधना नहीं, बल्कि शरीर पर प्रयोग बन जाता है।

🔬 वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी देता है चेतावनी

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार—

हर व्यक्ति की शारीरिक क्षमता और आयु अलग होती है।

अत्यधिक खिंचाव से जोड़ों और मांसपेशियों पर दबाव बढ़ता है।

रीढ़ और कंधों पर असंतुलित भार से दीर्घकालिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

अत्यधिक लचीलापन भी स्थिरता को कम कर सकता है।

इसलिए हर प्रभावशाली दिखने वाला आसन शरीर के लिए लाभकारी हो, यह जरूरी नहीं।

📜 “स्थिरसुखमासनम्” का संदेश आज भी प्रासंगिक

योगाचार्य ने महर्षि पतंजलि के सूत्र “स्थिरसुखमासनम्” का उल्लेख करते हुए कहा कि योग में आसन वही है जिसमें स्थिरता, सहजता और संतुलन हो। यदि कोई साधक सरल आसन में भी स्थिर और सजग है, तो उसका अभ्यास किसी जटिल आसन से कम नहीं है।

📱 सोशल मीडिया बना भ्रम का कारण

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने योग को प्रदर्शन का माध्यम बना दिया है। कठिन और आकर्षक आसनों को अधिक सराहना मिलती है, जबकि प्राणायाम, ध्यान और सरल अभ्यास उपेक्षित रह जाते हैं। इस कारण युवा अपने शरीर की सीमाओं को नजरअंदाज कर जोखिम उठा रहे हैं।

🧘‍♀️ योग: शरीर से संवाद, न कि संघर्ष

योगाचार्य सुमित कुमार सिंह ने कहा कि योग का उद्देश्य शरीर को चुनौती देना नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलित संवाद स्थापित करना है। योग की प्रगति बाहरी जटिलता से नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन और मानसिक शांति से मापी जानी चाहिए।

अंत में उन्होंने संदेश दिया कि योग को प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मदर्शन का माध्यम समझना चाहिए। जब योग विवेक, विज्ञान और संवेदनशीलता के साथ किया जाएगा, तभी यह वास्तविक रूप में स्वास्थ्य और जीवन साधना का आधार बन सकेगा।

Vedant Singh

Vedant Singh S/O Dr. Naveen Singh Mo. Belwadandi Po. Gandhi Nagar Basti Pin . 272001 Mob 8400883291 BG . O Positive vsvedant12345@gmail.com

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