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समता सेवा और भक्ति के प्रतीक :- निषादराज

बस्ती से वेदान्त सिंह
*निषादराज पंचमी*
*समता सेवा और भक्ति के प्रतीक :- निषादराज*
भारतीय नाविकों के राजा भगवन राम जी के स्नेही मित्र निषादराज जी की पावन जयंती चैत्र शुक्ल पंचमी को हर्षोल्लास एवं श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है। नाविकों के राजा निषादराज जी की जयंती भगवान श्री राम जी के प्रति उनकी श्रद्धा, निष्ठा, भक्ति हमें सामाजिक सदभाव, समता, समरसता, बंधुत्व, अटूट मित्रता की प्रेरणा देती है, हमें एकता, अखंडता, देशप्रेम और भाईचारा की सीख देती है। निषादराज पंचमी सामाजिक समरसता, एकता, सेवा, भक्ति की प्रतीक है, आज के दिन नदियों के किनारे गंगा तटों पर देश भर में जगह जगह भजन, कीर्तन, सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। प्रयागराज के निकट गंगा तट पर स्वर्ण नगरी श्रृंगवेरपुर में स्थित श्रृंगवेरपुर धाम में नाविकों के राजा निषादराज जी की भगवान श्री राम जी के मिलन की साक्षी 52 फीट ऊँची भव्य प्रतिमा,विशालकाय पार्क और भव्य कॉरिडोर को उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी के नेतृत्व वाली सरकार ने सन् 2025 में लगभग 14 करोड़ रुपये की लागत से निषादराज जी के सम्मान एवं धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु श्रृंगवेरपुर धाम को विकसित किया है, यह श्रृंगवेरपुर धाम प्रयागराज से लगभग 35 किलोमीटर दूर नदी किनारे है। निषाद पुरातन काल से ही जल, जंगल, जमीन और भारतीय संस्कृति के संरक्षक हैं, पोषक हैं। वास्तव में निषाद समाज नदियों का संरक्षक है, नदियों का संवाहक है। त्रेता युग में नाविकों के राजा निषादराज जिन्होंने वनवास के दौरान भगवान राम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी के स्नेही हृदय से चरण धोये, मैत्री भाव से गले लगाया और गंगा नदी पार कराई अर्थात् नैया पार कराई और केवट निषाद राज ने भगवान राम जी से नैया पार कराई भी नहीं ली बल्कि उनसे कहा कि मल्लाह से मल्लाह कोई नैया पार उतराई लेते हैं ? मैंने आपको नैया पार कराई है अतः आप भी मेरी नैया पार लगा दें। भगवान राम जी ने केवट निषाद राज के आग्रह को स्वीकार लिया और सदा सदा के लिए केवट निषाद राज को भव सागर से पार कर दिया था। नाविकों के राजा निषादराज जी ने भारतीय संस्कृति और नदियों को पुष्पित पल्लवित ही नहीं किया बल्कि उन्होंने जल जंगल जमीन के संरक्षण को अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। भगवान श्री राम जी के परम् स्नेही मित्र और नाविकों के राजा निषादराज जी के पावन श्री चरणों में कोटि कोटि नमन एवं प्रणाम प्रेषित करता हूँ।
*(लेखक रवीन्द्र राणा एक प्रकृति प्रेमी हैं)*

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