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बेहद जरूरी है जानलेवा पॉल्यूशन से बचाव – डॉ अर्चना दुबे

वेदान्त सिंह की रिपोर्ट
आज स्वास्थ्य पर जो सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है, वह है एअर पॉल्यूशन या वायु प्रदूषण का खतरा। एकमात्र एअर पॉल्यूशन ही अनेक जटिल व जानलेवा किस्म के रोग-विकारों का कारण बन सकता है। ऐसे में एअर पॉल्यूशन को लेकर जागरूकता और इससे बचाव बेहद जरूरी है
वर्त्तमान में गांवों से लेकर शहरों तक एअर पॉल्यूशन की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है। महानगरों का हाल तो और भी बुरा है। प्रदूषित वातावरण में श्वास लेना एक विकट समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार-हर साल 2-4 लाख लोगों की मृत्यु का कारण वायु प्रदूषण है, जबकि 1 से 5 लाख लोग आंतरिक वायु प्रदूषण से मारे जाते हैं।
एअर पॉल्यूशन से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एम्फाइसीमा, हार्ट डिजीज, एलर्जी, स्किन डिजीज आदि रोग-विकार ही नहीं होते, बल्कि आनुवंशिक प्रभाव पड़कर हमारी आने वाली पीढ़ियां भी इस दंश से पीड़ित रहेंगी।
बिना वायु के मनुष्य का जीवन 5-6 मिनट से अधिक नहीं रह सकता। अतः ऐसा जीवनीय तत्व ही जब दूषित हो जाए, तो सहज व स्वस्थ जीवन की कल्पना व्यर्थ है।
हवा में पॉल्यूशन लेवल को जांचने के लिए हवा में मौजूद विषाक्त कणों को मापा जाता है। इसी से निर्धारित होता है एअर पॉल्यूशन।
एस.पी.एम. (सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर), हवा में ठोस, धुआं व धूल के कण श्वसन से लंग्स तक पहुंचते हैं और हानि पहुंचाते हैं। पॉल्यूशन लेवल जांचने के लिए 2.5 पी.एम. शब्द आता है यानी फाइन पार्टिकुलेट मैटर। वे कण जो 2.5 पी.एम. से नीचे हैं, हवा में धुंधलापन (इनविजिबिलिटी-अदृश्यता) लाते हैं और श्वास के साथ ही अंदर जाकर केवल लंग्स ही नहीं, बल्कि ब्लड सर्कुलेशन व शरीर के प्रत्येक अंग तक पहुंचकर हानि पहुंचाते हैं। दिल्ली जैसे महानगरों में तो यह लेवल 20 से 30 गुना तक बढ़ जाता है और मेडिकल इमरजेंसी जैसे हालात पैदा हो जाते हैं।
इस हवा में कार्बन मोनो-ऑक्साइड, क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन, लेड ओजोन गैस, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर-डाइ-ऑक्साइड व बारीक धूल के कण मौजूद रहते हैं, जो कोहरा व ठंडी हवा के साथ मिलकर इतना भारी व दूषित वातावरण बना देते हैं कि न तो ऊपर ही उठ पाता है और न ही साफ हो पाता है और इस हाई पी.एम. लेवल के वातावरण में श्वास लेकर हमें आधुनिकीकरण, शहरीकरण व विकास की कीमत अपना अनमोल स्वास्थ्य चौपट करके चुकानी पड़ती है। स्पष्ट है. जहरीली हवा में श्वास लेकर हम स्वास्थ्य की कल्पना भी कैसे कर सकते हैं। कहा गया है-‘सी दवा और एक हवा। शुद्ध हवा दवा के समान है।
क्यों होता है एअर पॉल्यूशन ?
एअर पॉल्यूशन के लिए मुख्यतः निम्नलिखित कारण व परिस्थितियां जिम्मेदार हैं-
संसाधनों का अंधाधुंध प्रयोग बढ़ती हुई जनसंख्या संसाधनों का अंधाधुंध प्रयोग कर रही है। शहरीकरण, कटते जंगल इस धरती को एवं इस धरा पर रहने वालों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
बढ़ते हुए उद्योग
इंडस्ट्रीज तेजी से बढ़ रही हैं तथा इनसे निकलने वाला धुआं व हानिकारक रसायन वातावरण में घुलकर वायुमंडल को दूषित कर रहे हैं। भोपाल गैस त्रासदी से हजारों लोगों को असमय मौत का सामना करना पड़ा और जो जीवित रहे वे विकलांग हो गए व बीमारी से जूझते रहे।
यातायात के साधन
बढ़ती आबादी के साथ ही मोटरकार, स्कूटर, मोटरसाइकिल, ट्रक, बस आदि वाहनों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है और इनसे निकलता धुआं वायुमंडल को लगातार विषाक्त कर रहा है।
जंगलों की कटाई
कभी सड़कें बनाने के लिए, तो कभी घर, फ्लैट बनाने के लिए, कभी रेलवे ट्रैक, तो कभी बांध, पुल या अन्य प्रोजेक्ट के लिए, विकास के लिए सर्वप्रथम पेड़ों की ही बलि चढ़ायी जाती है। इस प्रकार वायुमंडल को शुद्ध करने के साधन हम स्वयं अपने ही हाथों से नष्ट करते हैं।
क्या हैं एअर पॉल्यूशन के दुष्प्रभाव ?
एअर पॉल्यूशन के प्रमुख दुष्प्रभाव निम्नलिखित रूपों में भुगतने पड़ सकते हैं-
• दूषित वायुमंडल में श्वास लेने से न केवल श्वसन संस्थान को हानि पहुंचती है, बल्कि यह प्रदूषण ब्लड में घुलकर शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुंचता है और उसको दूषित करता है।
• नाक की झिल्ली से धूल-धुआंयुक्त हवा जब टकराती है, तो इरिटेशन होता है, जिससे नाक से पानी आना, छींकें आना, गले में खराश आदि समस्याएं परेशान करती हैं और दम घुटता-सा महसूस होता है।
लगातार एअर पॉल्यूशन वाले स्थान पर रहने व श्वास लेने से सी.ओ.पी.डी., टी.बी., अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एलर्जिक ब्रोंकाइटिस आदि के अलावा लंग्स कैंसर तक हो सकता है।
एअर पॉल्यूशन से आंखों में जलन, आंखों में पानी आना, आंखें लाल रहना, खुजली व घाव आदि समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
दूषित वायुमंडल में स्थित बारीक कण (नैनो पार्टिकल्स) श्वसन के साथ अंदर जाकर ब्लड सप्लाई से कैपिलरीज तक पहुंचकर ब्लड वेसल्स के वॉल्यूम को कम करके हाई बी.पी., स्ट्रोक के साथ ही हार्ट की रिद्म को अनियमित भी कर देते हैं।
एअर पॉल्यूशन का दुष्प्रभाव किडनी तक पहुंचकर किडनी की वर्किंग कैपेसिटी प्रभावित होकर किडनी डैमेज तक हो सकती है।
नर्वस सिस्टम पर भी एअर पॉल्यूशन का दुष्प्रभाव पड़ता है, जिससे याददाश्त में कमी, चिड़चिड़ापन, तुनकमिजाजी, नींद की कमी आदि परेशानियां होने लगती हैं।
एअर पॉल्यूशन के दुष्प्रभाव से बचाव
प्रदूषित वातावरण में रहने से इम्यूनिटी पॉवर कमजोर हो जाती है और तरह-तरह की स्वास्थ्य समस्याएं जीवन को संकट में डाल देती हैं। अतः इससे बचाव को लेकर सजग रहना बहुत जरूरी है।
एअर पॉल्यूशन के दुष्प्रभाव से बचाव हेतु कुछ उपयोगी सुझाव निम्नलिखित हैं-
अपने खान-पान व लाइफ स्टाइल में सुधार करें।
नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर नहाएं तथा बाल भी धोएं।
10-15 तुलसी की पत्तियों का रस निकालकर सेवन करें अथवा तुलसी, अदरक, काली मिर्च, लौंग और दारचीनी पानी में उबालकर रोजाना यह 1-1 कप काढ़ा पिएं।
आधा चम्मच हल्दी (भुनी हुई), 1 चम्मच शुद्ध घी और 2 चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम लें।
गाय के घी की 2-2 बूंदें दोनों नासिका छिद्रों में टपकाएं।
भोजन में गाय का घी कम-से-कम 2 से 3 चम्मच की मात्रा में रोजाना लें, ताकि लेड व मर्करी जैसे अशुद्ध कणों की विषाक्तता (टॉक्सिसिटी) नष्ट हो सके
घर से बाहर मास्क लगाकर या सूती कपड़ा मुंह पर लपेटकर निकलें। पूरा शरीर ढककर बाहर निकलें। बाहर से आते ही हाथ-पैर व मुंह धो लें, संभव हो, तो गुनगुने पानी से नहा लें और गुड़ की छोटी-सी डली खाएं।
गरम पानी की भाप लें।
प्राणायाम व योगासन शुद्ध वातावरण में करें। हाई-वे व बाजार के आसपास के घरों के बरामदों में भी पॉल्यूशन रहता है। अतः पार्क या बगीचे में ही योगाभ्यास करें।
बाहर घूमने जाएं, तो पूरी एहतियात बरतें। जिस ओर ट्रैफिक कम हो या न के बराबर हो और वृक्ष लगे हों, वहां पर ही घूमें। सड़क पर, ट्रैफिक वाली जगह पर घूमने से लाभ की बजाय हानि हो सकती है।
सुबह-शाम कोहरे से हवा भारी हुई रहती है और इस समय वाहनों का धुआं नीचे ही रहता है। अतः ऐसी जगहों पर बच्चों को न ले जाएं।
*डॉ अर्चना दुबे*, अध्यक्ष
अखंड एक्यूप्रेशर रिसर्च ट्रेंनिंग एंड ट्रीटमेंट इंस्टीट्यूट, प्रयागराज
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*अर्चना दुबे हेल्थ लैब*

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